युद्ध या शान्ति? क्या है आपका चुनाव? : Hemmano Guest Column
समसामयिक

युद्ध या शान्ति? क्या है आपका चुनाव? : Hemmano Guest Column

युद्ध या शान्ति? क्या है आपका चुनाव?

दुनिया ईसा मसीह के जन्म के बाद से अब 21वीं सदी में पहुँच गयी है, ईसा के जन्म से पहले भी दुनिया का बहुत बड़ा इतिहास था लेकिन पूरा कत्लों, युद्धों, लड़ाइयों से भरा हुआ.

बुद्धकाल के बाद से ही बेहद उम्मीद थी कि संसार में क्षीण होती संवेदनाओं को पुनः ऊर्जा मिलेगी और लोग युद्धों से परे हट पायेंगे. लेकिन मनुष्यों में प्रेम से ज्यादा क्रूरता भरी हुई थी. अपनी शारीरिक ऊर्जा को केवल लड़ाई द्वारा ही उपयोग में लिया जाता था.

युद्ध या शान्ति? क्या है आपका चुनाव? : Hemmano Guest Column

समय का पहिया चला तो युद्धों की भीषणता और बढ़ गई. आक्रमणकारी और सत्ता के लालची बेतरतीबी से हर कहीं लड़ाई छेड़ आते थे. हजारों की संख्या में निर्दोष सैनिक मारे जाते तो कभी राजा भाग छूटता और कभी वो विपक्ष से संधि कर लेता.

विज्ञान युग आया तो यह सोच फिर से बलवती हुई कि अब तो युद्धों से छुटकारा मिलेगा. लेकिन इस युग ने और ज्यादा भयावह आण्विक हथियारों का निर्माण कर लिया, पहले 10 जिंदा लोगों को लाशें बनाने के लिए बड़ी मेहनत लगती थी, लेकिन अब यही काम एक खटके को दबने में लगने वाली पल भर की देरी से होने लगा.

युद्ध या शान्ति? क्या है आपका चुनाव? : Hemmano Guest Column

दोनों विश्वयुद्धों के बाद हथियारों की इतनी बड़ी खेप हर द्वीप पर हो गयी कि संदेह और शंका का भाव अब सब जगह बन गया. इतिहास के कत्लेआमों को देखें तो पिछले 70-75 वर्षों से दुनिया में शांति कायम हुई है. ये शांति ऐच्छिक नहीं है बल्कि बढ़ते भय और आशंकाओं की शान्ति है. इस शान्ति में सहअस्तित्व की भावना को बढ़ावा दिया गया है हालाँकि है वो भी संधि मात्र ही.

शांति के अमृत-शोध में टपकता अशांति का विष-

2020 की शुरुआत हुई तो अमेरिका-ईरान के मध्य कई दशकों से बने आ रहे रिश्ते और ज्यादा बुरे हो गए. लोगों ने मान लिया कि तीसरा विश्व युद्ध हो सकता है और इस बार अगर ये युद्ध शुरू हो गया तो पिछले विश्वयुद्धों की भांति कई वर्षों तक न चलकर संभवतः एक हफ्ते से भी कम समय में निपट जाएगा. लेकिन विश्वभर में संधियों की उलझनों ने दोनों राष्ट्रों को शांत रखा.

वैश्विक महामारी नावेल कोरोनावायरस के बाद विश्व के देशों में सबसे प्रभुत्वशाली देश अमेरिका ने चीन के प्रति कुपित कथन कहे. विभिन्न राष्ट्रों ने चीन का त्याग और विरोध करना शुरू किया. चीन के अन्दर भी जनता ने भयंकर उथल-पुथल मचाई जिससे सत्ता संकट में आ गई. चीन ने जन-व्यवहार की दिशा को बदलना चाहा और अपनी धूर्त विस्तारवादी नीतियों से पडोसी राष्ट्रों से सीमा-विवाद छेड़ दिया.

युद्ध या शान्ति? क्या है आपका चुनाव? : Hemmano Guest Column

घर में मनमुटाव होने के बावजूद भी जब घरवाले के साथ पडोसी लड़ता है तो पूरा घर पडोसी के खिलाफ आ खड़ा होता है. चीन ने अपनी इसी राष्ट्रवाद की भावना को अपनी जनता में जगाया. परिणामस्वरूप जनता ने भी आंतरिक कलह की बजाय सीमा की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया.

आज भारत और चीन के मध्य युद्ध की स्थिति पनप रही है, गलवान घाटी इलाके में लगातार संदेहास्पद गतिविधियाँ और समस्याएँ बढ़ रहीं है.

संसार फिर से युद्ध की ओर जा रहा है, लोग आज भी युद्ध या शान्ति के चुनाव में से युद्ध को ही उचित विकल्प मान रहे हैं. लोगों का शरीर 21वीं सदी में खड़ा है लेकिन मन आज भी विश्वयुद्धों के बीच घूम रहा है.

युद्ध की प्रकृति सिनेमेटिक नहीं होती, युद्ध तो खून-खराबे का एक बेहद क्रूर समंदर है. एक-दूसरे से अनजान और बिना द्वेष के भी एक-दूसरे को मार डालने की कोशिश को कोई क्या कहेगा?

मरने वाले के पक्ष का कवि करुण-रस में कविताएँ लिखेगा और मारने वाले के पक्ष का कवि वीर-रस की कविताएँ कहेगा. राष्ट्र के इन प्रहरियों की हिम्मत को नकारा नहीं जा सकता, जिस हिम्मत और दृढ़ता से पीछे न हटने की कसमें खाते ये योद्धा शहीद हो जाते हैं वैसी उम्मीद हम हमारे कुंजीपटल योद्धाओं से नहीं कर सकते जिनके दिमाग में युद्ध की छवि केवल फिल्मों से बनती है.

‘’युद्ध को नकारने का अर्थ युद्ध से घबराना नहीं होता’’|

21वीं सदी में अपना पहला पैर रखे खड़ी इस दुनिया को समझना होगा कि युद्ध, सीमा, पर-नागरिक जैसे शब्दों और इनकी वृत्तियों को उन्हें पिछली सदी से इस सदी में लाना ही नहीं था.

हाँ, हम चीन के खिलाफ राष्ट्र के साथ खड़े हैं, धूर्त चीन के विद्रोह में और अपने फौजियों के प्रति हमारी असीम भावनाएँ हैं लेकिन युद्ध किसी चीज़ का समाधान नहीं हो सकता. चीन अपनी अंदरूनी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए ऐसा माहौल बना रहा है. भारत को भी सूझबूझ से अपनी सदियों की बुद्धिमता का परिचय देना चाहिए. युद्ध न तो प्रतिरोध का सूचक है और न ही श्रेष्ठता का. प्रधानमन्त्री नरेंद मोदी के शब्दों में कहें तो “युद्ध से छुटकारा, केवल बुद्ध के मार्ग पर चलकर संभव है।

अतः युद्धों का महिमामंडन बंद होना चाहिए, बिना संवाद कभी भी इतिहास में हल नहीं निकला इसलिए युद्ध से अधिक संवाद को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.

योद्धा जिएँ, युद्ध मरे


(प्रकाशित आलेख में व्यक्त विचार, राय लेखक के निजी हैं। लेखक के विचारों, राय से hemmano.com का कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई भी व्याकरण संबंधी त्रुटियां या चूक लेखक की है, hemmano.com इसके लिए किसी तरह से भी जिम्मेदार नहीं है। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।)

लेखक महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय से इतिहास स्नातकोत्तर उत्तरार्ध के छात्र हैं

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