विद्या सिन्हा : बीते हुए कल की कुछ यादें
फिल्मी जगत

विद्या सिन्हा : बीते हुए कल की कुछ यादें

अपने समय की महत्वपूर्ण अभिनेत्री विद्या सिन्हा इस दुनिया को पिछले साल अलविदा कह गई थी। विद्या सिन्हा की जिंदगी अभिनय के मर्म की तलाश थी। एक बेकल आत्मा की जिंदगी थी। विद्या सिन्हा ने चमचमाती हुई स्टारडम वाली फिल्मों में अभिनय नहीं किया। वह उनके लिए आसान रास्ता था क्योंकि वह फिल्म वितरक पिता की संतान थी।

उन्होंने भारतीय समाज के मर्म पर चोट करती हुई फिल्में चुनी। इस बात को हम दूसरे तरीके से भी कह सकते हैं ‘‘यह फ़िल्में विद्या की नियति में पहले से लिखी थी। बासु चटर्जी ने रजनीगंधा फिल्म के लिए उन्हें चुना। यह फिल्म मन्नू भंडारी की कहानी का सिनेमाई एडॉप्शन था।

विद्या सिन्हा : बीते हुए कल की कुछ यादें

फिल्म ने भारतीय परिवारों के तनाव –विघटन और इन स्थितियों के बीच जीती एक स्त्री के जीवन को आधार बनाया। विद्या सिन्हा ने इस भूमिका को इतनी सघनता के साथ अपने अंदर उतारा कि हमेशा के लिए रजनीगंधा हो गई। रजनीगंधा फूलों की खुशबू वक्त के साथ और गहरी होती चली गई। अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा की टाइमिंग फिल्म में इतनी इंटेंस थी वह लोगों की दिल में नहीं,रूह में उतर गई।

लोग सिनेमा हॉल से रजनीगंधा देखकर जब अपने घर लौटे तब वह अपने साथ हमेशा हमेशा के लिए एक बिम्ब कल्पना, एक स्वप्न लेकर लौटे। फिल्में स्वप्न को मन में सहेज कर रखने की ही तो कहानी है। यह अलग बात है विद्या सिन्हा को इतना बड़ा स्टारडम जीवन में ना मिला हो मगर उनकी गिनती हमेशा अत्यंत प्रतिभाशाली एक्ट्रेस में होती रही। उन्होंने अपनी पूरी स्किल जिंदगी का एक प्रामाणिक स्केच खींच देने में लगा दी।

विद्या सिन्हा : बीते हुए कल की कुछ यादें

सीधे सरल और आराम याफ्ता रास्ते विद्या को कभी पसंद नहीं थे। उन्होंने तो जीवन का वह रास्ता चुना जो खुद्दारी पर निर्भर था। जिसमें ईमानदारी थी। अब सच का गरल गर हिस्से में आया भी तो वह नियति का फल मानकर मुस्कराते हुए स्वीकार किया।

विद्या का समय आज के जैसे तमाम विकल्पों और सूचना संचार का समय नहीं था। उस समय इमेज बिल्डिंग के लिए निजी एजेंसियां भी नहीं थी। आपका काम ही आपका नाम तय करता था। विद्या सिन्हा ने में बेहतर काम किया। बेलौस और बेलोच अंदाज़ में जीवन जिया।

वह एक खुद्दार स्त्री का प्रतीक भी हैं। जो खुद जिम्मेदारियों उठाना जानती है। सिनेमाई दुनिया के फ्रेम से बाहर जाकर जिंदगी के खुरदुरेपन का सामना करना भी। उनकी फिल्मों के गीत मेरे मन के बहुत करीब हैं।

किसी के जाने के बाद

फिल्म ”छोटी सी बात” का यह गीत बेहद मार्मिक है। गीत के बोल लिखे हैं योगेश ने, योगेश वही जिन्होंने हिंदी सिनेमा को कई सारे मधुर गीत दिए। बसु चैटर्जी के साथ उनकी एक लंबी पारी रही। संगीत सलिल चौधरी और गीत गाया हिंदी सिनेमा के दो जीनियस गायक एवं गायिका मुकेश एवं लता ने। गीत अपनी गहरी फिलॉसफी और मन तक पहुंच के लिए मशहूर हुआ।

विद्या सिन्हा : बीते हुए कल की कुछ यादें

गीत मन की उलझन के साथ शुरू होता है। जो मन की उलझन है, जो एक शाश्वत द्वंद है उसको कैप्चर करता है। मानव मन की उथल-पुथल को जैसे आवाज देता है। यह गीत ह्यूमन साइकोलॉजी की गहरी समझ के बिना लिखा ही नहीं जा सकता था। और इस गीत में छुपे गहरे एकांत से उपजे धीमी सी उदासी के भाव को पकड़ना और भी ज्यादा कठिन था।

यह योगेश ने संभव बनाया। जिंदगी के गहरे समंदर में डूब कर ही ऐसे शब्द मोती खोजे जाते हैं अथवा सृजित किए जाते हैं। लफ्ज़ जैसे सीधे कलेजे को लगते हैं।

न जाने क्यूं, होता है जिंदगी के साथ,
किसी के जाने के बाद, अचानक ये मन,
फिर करें उसकी याद, उसकी छोटी– छोटी सी बात, न जाने क्यूं

गीत शबे हिज्र का है। प्रिय के जाने के बाद की स्मृतियां मन को कचोटती हैं। जैसे वो अपने साथ जिंदगी का सहारा भी ले गया और ले गया जिंदगी जीने का सामान। अब जिंदगी अल्बर्टो मारिया के उपन्यास एम्प्टी कैनवास की तरह है। जिसमें बस उदास राग ही बजता है। बचती हैं आंखों में कुछ नमी। पहाड़ में झमाझम होती बारिश की धुंध से बरसते आंसू। जो आंखों को उजाड़ बना देते हैं।

गालिब ने कही कहा भी है, दर्द को दिल में जगह दे ए नासिख़, इल्म से शायरी नहीं आती। मगर दर्द है कि चेहरे पर अपना स्थाई बसेरा बना लेता है।

यहां पर शब्दों को जज्बातों की गहराई में डुबाती मुकेश और लता की आवाज ना होती तो यह गीत वक्त को पीछे छोड़ देने की ताकत ही ना रखता। एक गहरी तरन्नुम मुकेश के गले की मार्फत हम तक पहुंचती है। हम उस आवाज से विस्मित होते हैं अचंभित होते हैं। जैसे समय ठहर जाता है और हम सुनने लगते हैं अपने मन की आवाज जो इस आपाधापी में हमसे कहीं बिछड़ गई थी। अपने अंदर का एक वीराना अपनी जगह तलाशने लगता है। जैसे विरह में क्रौंच पक्षी आकुल हो, व्याकुल हो|

विद्या सिन्हा : बीते हुए कल की कुछ यादें

छोटी छोटी सी बातें कई बार जीने का सामान बन जाती हैं। और बहुत याद आती हैं। यह अक्सर होता जिंदगी के महीन धागों के उलझने के बाद। जैसे पोरों पर पोरों का स्पर्श हमेशा शेष रह जाता है। रह जाती हैं शेष अनकही बातें। कभी अब कभी कहा नहीं जाना है। यही यह ही शायद जीवन है।

जो अनजाने पल, ढल गए कल, आज वो रंग बदल –बदल, मन को मचल–मचल, छल रहे हैं क्यूं, कहां गई वह शामें-मदभरी,
मेरे वो दिन गए किधर, ना जाने क्यूं

जो वक्त साथ में था। तब वह धूल था, मगर जैसे ही वह हाथ से फिसला सोना हो गया। एक जगह जावेद अख्तर ने लिखा भी है ‘तुम्हें भी याद नहीं और मैं भी भूल गया/वह लम्हा कितना हसीन था मगर फिजूल गया’ यही है जीवन। वक़्त का स्वभाव है बदल जाना। ठहरता कुछ नहीं।

गाने में नायिका अपने उन दिनों को याद कर रही है ,जब शामों में रंगत थी और दिन उजले थे। शाम को रंगत कहने से ज्यादा यह कहना ठीक होगा शामों में पुहूप वास थी। फूलों की भीनी– भीनी गंध। जैसी गंध घरों में अगरबत्ती जल जाने के बाद आती है। कुछ-कुछ इत्र सी। शामे तो उनसे मद भरी हो ही जाएंगी।

मगर जब वह दिन जाते हैं तो अपने साथ बहुत कुछ लेकर चले जाते हैं। छोड़ जाते हैं उन यादों के साथ जो मिट कर भी नहीं मिटती। एक सघन उत्ताप, दर्द पीड़ा हूक रह जाती है।

सजे बिन मेरे नैनों में/टूटे रे हाय मेरे सपनों के महल
वही ही है डगर/वो ही है/
अरे नहीं पास मेरे मगर मेरा हमसफ़र
इधर –उधर ढूंढे नजर/नहीं मेरे मेरा हमसफ़र

बात यहीं से शुरू होती है। किसी एक शख्स के जाने के बाद जिंदगी में कितना कुछ बदल जाता है। यह गाना उसी मनो:स्थिति का एनालिसिस है। इस गाने के प्राण बसते हैं लता मुकेश की आवाज में, योगेश के बोल में, जयदेव के संगीत में और विद्या सिन्हा के लाजवाब अभिनय में।

विद्या सिन्हा : बीते हुए कल की कुछ यादें

इस पूरे गाने में आप देखेंगे विद्या सिन्हा छोटे छोटे भावों को कितनी बारीकी से अपने मूक मुख अभिनय से अभिव्यक्त कर रही हैं। एक गहरा मान–अभिमान का भाव। बस स्टॉप पर अंतहीन प्रतीक्षा का भाव। इस प्रतीक्षा ने जैसे नायिका के चेहरे पर इंतजार की बारीक रेखाएं खींची दी हों। जैसे कालिदास की नायिका किंचित को कोपयुक्त होने के भाव मैं जी रही हो।

विद्या सिन्हा मन:स्थिति को आग के दरिया में पार जाने की तरह जीती हैं। कमाल अभिनय। जो कभी-कभी ही देखने को मिलता है।

इस अनुभूति को वही स्त्री जी सकती है जिससे अपने पांव के नीचे की जमीन पर पूरा यकीन हो।


(प्रकाशित आलेख में व्यक्त विचार, राय लेखक के निजी हैं। लेखक के विचारों, राय से hemmano.com का कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई भी व्याकरण संबंधी त्रुटियां या चूक लेखक की है, hemmano.com इसके लिए किसी तरह से भी जिम्मेदार नहीं है।)

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Dr. Vipin Sharma

विपिन शर्मा किताबें: मनुष्यता का पक्ष, नई सदी का सिनेमा, आजादी की उत्तर गाथा। नया ज्ञानोदय, पाखी, परीकथा, अकार, कथा क्रम, जनवाणी, आदि में कहानियां एवं लेख प्रकाशित।

 

 

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