द लंचबॉक्स : फिल्म समीक्षा
फिल्मी जगत

द लंचबॉक्स : फिल्म समीक्षा : Hemmano Guest Column

द लंचबॉक्स


डियर ईला,द फूड वॉज सॉल्टी टूडे।

बेहतरीन फिल्मों में एक अलग तरह की खूबसूरती होती है और उसी प्रकार की खूबसूरती नजर आती है 2013 में रिलीज हुई रितेश बत्रा निर्देशित मूवी “द लंचबॉक्स” में।

मारधाड़, शोर-शराबे और चकाचौंध से दूर ये फिल्म बेहद शांत और शालीन है। ये फिल्म जीवन में प्रेम के खत्म होते विकल्पों और सम्भावनाओं को नए सिरे से तलाशने की कहानी है।
ट्रैलर देखने से ये कहानी महज एक लव-स्टोरी लगती है किंतु ये फिल्म केवल एक प्रेम कहानी न होकर अवसादों से भरी जिंदगी की परतें खोलती कहानी है।
द लंचबॉक्स : फिल्म समीक्षा
कहानी के मुख्य किरदार में एक तरफ एक शादीशुदा महिला ईला(निमृत कौर)है जो एक बच्चे की मां है किंतु अपने पति द्वारा उसे प्रेम की बजाय तथाकथित महानगरीय ठण्डक प्राप्त होती है वहीं दूसरी तरफ अपने रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़ा एक अकाउंटेंट फर्नांडीज (इरफान) जिसकी पत्नी उसका साथ बहुत पहले छोड़ कर स्वर्ग सिधार चुकी है और वो एक घिसी-पिटी महानगरीय दिनचर्या जी रहा है। दोनों की उबाऊ और शिकायतभरी जिंदगी में एक नया स्वाद लेकर आता‌ है ईला द्वारा अपने पति को भेजा गया “जायकेदार लंचबॉक्स” जो कि डब्बावालो की गलती से फर्नांडीज को पहुंच जाता है। ईला इस गलती का अहसास कराने के लिए फर्नांडीज को पत्र लिखती हैं और धीरे-धीरे ये लंचबॉक्स और उनके अंदर ये पत्र उनके संवाद का माध्यम बन जाते हैं।
ये लंचबॉक्स महज उन दोनों के ही नहीं वरन फर्नांडीज की तरह उबाऊ दिनचर्या और ईला की तरह खोखली जिंदगी जी रहे सैंकड़ों लोगों की जिंदगी की कहानी है और इस लिखित संवाद में एक-दूसरे के सामने बिछ जाती है दोनों की हदें, दोनों की अभिलाषाएं और दोनों की जिंदगी जो इस घटना के बाद खुद को नए स्वाद के साथ दुबारा शुरू करती है। इन दोनों के अलावा दुनिया के और भी पहलू है जिन्हें हमारे सामने पेश करते हैं – शेख(नवाजुद्दीन सिद्दीकी), देशपांडे आंटी(जो कि महज एक आवाज है भारती आचरेकर की) और ईला की मां(लिलिट दुबे)।  द लंचबॉक्स : फिल्म समीक्षा
शेख एक अनाथ और मासूम सा आदमी है जो फर्नांडीज से अकाउंटेंट का काम सीखने आता है लेकिन आप उसकी मुस्कान और उसकी मासूम साजिशों(जैसे स्कूटर पाने की) में खुद को तलाश सकते हो वहीं देशपांडे आंटी आपको महिलाओं का एक ऐसा नजरिया दिखाती है जिससे आप महिलाओं के प्रति कृतज्ञता की भावना से भर जाते है और ईला की मां आपको विवाहित महिला के अलग ही पहलू से अवगत करवाती है जिसमें खीझ है,बोझिलपन है और अपने मर चुके बेटे के प्रति जीवित अभिलाषाएं हैं।
इसके अलावा फिल्म की एक बेहतरीन बात यह भी है कि इसमें संवाद से ज्यादा दृश्य है जिस कारण मुम्बई शहर खुद एक पात्र की तरह कहानी कहता है। इस फिल्म की एक्टिंग की बात करना बेमानी होगी क्योंकि ये महज फिल्म नहीं, एक वास्तविक अहसास है और इसमें एक्टर नहीं महज किरदार है। ऐसे किरदार जिनमें आप कहीं न कहीं एक अलग कहानी तलाश लेते हैं। ये फिल्म दर्शाती है कि किस तरह 45 साल के व्यक्ति में एक वास्तविक 60 साल के व्यक्ति जैसी खीझ, अभिलाषाएं और भावनाएं लाई जा सकती है।
द लंचबॉक्स
Image Credit : ScoopWhoop.com
मैं कह सकता हूं कि नवाजुद्दीन और निमृत ने अपने किरदार को महज निभाया नहीं वरन जिया है। इस फिल्म का क्लाइमैक्स तो और भी बेहतरीन है जो फिल्म देखने के बाद भी हमेशा आपके साथ रहेगा और आपको जीवन के हर मोड़ पर अपना ही बनाया अंत बदलना पड़ेगा। ऐसी फिल्में देखकर मुझे भारतीय सिनेमा पर गर्व होता है जो बिना किसी चकाचौंध,अश्लीलता और फूहड़ता के खूबसूरत कहानियां दर्शकों के सामने परोसने का माद्दा रखता है। जिंदगी की जटिलता को सरलता में पिरोने की पेशकश है “द लंचबॉक्स”
(प्रकाशित आलेख में व्यक्त विचार, राय लेखक के निजी हैं। लेखक के विचारों, राय से hemmano.com का कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई भी व्याकरण संबंधी त्रुटियां या चूक लेखक की है, hemmano.com इसके लिए किसी तरह से भी जिम्मेदार नहीं है।)
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मोहित कुमार बगड़िया

विद्यार्थी, निजी विद्यालय में अध्यापन। कविता और कहानी लेखन में विशेष रुचि, साहित्य और सिने प्रशंसक।

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