सोनू सूद भारत के ओस्कर शिंडलर
समसामयिक

क्या सोनू सूद हैं भारत के ओस्कर शिंडलर?

सोनू सूद भारत के ओस्कर शिंडलर


भारत के मजदूरों का पलायन इस सदी की एक बड़ी त्रासदी है, चुनाव के वक़्त जिन्हें केवल वोटर के रूप में देखा जाता है और उनकी जरुरत के समय उनसे मुँह फेर कर उन पर लिखी कविताओं पर वाह-वाह किया जाता है.

Lockdown के सबसे विकट समय में जब हम भगवान राम को वनवास जाते देख रहे थे तब हजारों मजदूर हजारों किलोमीटर दूर बसे अपने गाँवों की ओर पैदल ही रवाना हो चुके थे. सैंकड़ों की संख्या में मजदूर मर गए, कई लाशें रास्तों पर अपने पेट पकड़ी हुई पड़ी थी तो कहीं बिस्किट खाकर चलते लोग सड़कों पर कुचल दिए गए थे. कुछ ने इस पदयात्रा में रोटियों का जुगाड़ भी कर लिया था लेकिन खाने से पहले किसी ट्रेन के नीचे कट गए.

मजदूरों की विलाप करती तस्वीरों ने फोटो जर्नलिस्ट्स को फेमस कर दिया. मजदूरों के वीडियोज कई चैनलों ने एक्सक्लूसिव का टैग लगाकर चलाए.

जब नगरों में फैक्ट्रियां बंद हो रहीं थी तब कोई उद्योगपति कंगाल नहीं हुआ था, लेकिन रातोंरात उन फैक्ट्रियों के हर दिन खुलने की आस में बैठे हजारों मजदूर ने मान लिया था कि उनके मालिक गरीब हैं, सरकार ही गरीब है. बेचारी सरकार के पास पैसा नहीं है, बिना पैसे वाले के ये रात-दिन सड़कों पर चलने वाले दम्भी और कई शिष्ट बसवाले कहीं नहीं जाते.

ओस्कर शिंडलर –

लॉकडाउन की घोषणा हो जाना मजदूरों के लिए पीड़ादायक था, उन्हें नहीं पता था कि इस अंग्रेजी शब्द ने बरसों से चलती आई रेलगाड़ी को भी बंद कर दिया था. सॉफ्टवेर, हार्डवेयर, साहित्यिक, शैक्षणिक और भी कई क्षेत्रों के लोग अपने परिचित अधिकारियों या डिजिटल एप्लीकेशन के माध्यम से अपने घरों की ओर जा रहे थे.

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फिल्मी पर्दे के ओस्कर शिंडलर- Schindler’s List फिल्म से

पिछले दिनों लॉकडाउन के दौरान घर के सोफों, बेडों पर लेटे लोगों ने काफी फ़िल्में देखी. एक फिल्म फिर से चर्चा में आ गयी – वो थी यहूदियों के नरसंहार पर बनी ‘’Schindler’s List’’.  ओस्कर शिंडलर एक उद्योगपति और नाज़ी पार्टी का सदस्य था उसने खुद के बूते करीब 1200 यहूदियों को इस नरसंहार से बचाया था. अपनी पूरी सम्पति को उसने इन यहूदियों पर न्यौछावर कर दिया था जबकि वह खुद उसी नाज़ी सत्ताधीन पार्टी का सदस्य था जिसने यहूदियों के इस संहार की पटकथा लिखी थी.

सोनू सूद भारत के ओस्कर शिंडलर
यहूदियों की निरपराधता

तो Oskar Schindler में यह दया की भावना कैसे आई, क्यों उसने यहूदियों से घृणा करने की बजाय उनके प्रति दरियादिली दिखानी शुरू की? पूरी फिल्म Black&White परदे पर दिखती है लेकिन भीषण नरसंहार के बीच एक नन्ही सी बच्ची Oskar Schindler को दिखती है जो लाल कपड़ों में होती है –  वह बच्ची यहूदियों की बेगुनाही को दर्शाती है और एक इंसान होने के बावजूद चुप बैठे सामर्थ्यवान लोगों के मुँह पर कलंक दर्शाती है.

Oskar Schindler ने उसी निरपराधता को पहचाना और जितना हो सका उतने यहूदियों को उसने बचाने की कोशिश की. लेकिन Oskar जैसी यही दृष्टि बाकी रईसों या सामर्थ्यवान लोगों में होती तो क्या यहूदी नरसंहार को रोका नहीं जा सकता था? क्या मरने वाले यहूदियों की संख्या को कम नहीं किया जा सकता था?

सोनू सूद भारत के ओस्कर शिंडलर
असल ज़िन्दगी के ओस्कर शिंडलर

लेकिन किसी ने ज़िम्मेदारी की भावना से नहीं देखा, जो दरियादिल थे वे अफ़सोस करते रह गए. जिन्हें यहूदियों से नफरत थी वो उन्हें ढूंढ-ढूंढकर सरकार के हवाले कर देते थे.

भारत की आज की स्थिति-

जिस प्रकार भारत में मजदूरों का पलायन हुआ तो शुरुआती दिनों में यह उम्मीद थी कि जिस तरह प्रधानमत्री केयर फंड में लोगों ने घर बैठे ही बढ़-चढ़कर दान दिया उसी प्रकार इन बिलखते मजदूरों की व्यथा पर भी ध्यान दिया जाएगा. बड़े-बड़े सेलेब्रिटी और नेता इन मुद्दों पर चुप्पी ताने बैठे रहे और मजदूर रात-दिन अपने बच्चों और बूढों को कन्धों पर बिठाए अपने गाँव की ओर बढ़ रह थे.

सोनू सूद भारत के ओस्कर शिंडलर

भारत में 150 के करीब अरबपतियों, कई हजारों करोड़पतियों और लखपतियों के होने के बावजूद मजदूर पैदल चलते रहे. सरकार मौन धरे रही. राज्यों के बीच बसों को लेकर गंदा राजनैतिक खेल शुरू हो गया था.

भारत का ओस्कर शिंडलर –

तब अचानक से सोनू सूद नामक अभिनेता ट्विटर से मजदूरों को घर भेजने के लिए प्रयत्न शुरू करते हैं. देखते ही देखते अपनी पूरी टीम बना लेते हैं और करीब बीस हजार मजदूरों को घर भेज देते हैं. अगर सोनू सूद को भारत का ओस्कर शिंडलर कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. सोनू सूद की ही बदौलत न जाने कितने ही मजदूरों की जिंदगियां बच गयी और हजारों स्त्रियों, वृद्धों और बच्चों को कोई दर्द नहीं उठाना पड़ा. सोनू सूद की सम्पति करीब 130 करोड़ है और उनसे ज्यादा अमीरों की संख्या भारत में हजारों में हैं. सोनू सूद ने जैसे भी हो सका, वैसे प्रवासियों को घर भेजा इसमें बसें, गाड़ियां और एरोप्लेन तक सम्मिलित हैं.

सोनू सूद भारत के ओस्कर शिंडलर

हालाँकि ओस्कर शिंडलर की परिस्थितियाँ अलग थी, उसकी जंग सीधे सरकार से थी और बाधा आने के हजार कारण थे। भारत की परिस्थितियां बेहतर हैं, मजदूरों से किसी का द्वेष नहीं है लेकिन सरकारों ने भी उन्हें नज़रअंदाज किया है। आज के भारत की तुलना तब के जर्मनी से नहीं की जा सकती है। लेकिन सोनू सूद को ओस्कर शिंडलर कहने में क्या हर्ज़ है? सोनू सूद ने जैसी हिम्मत और दरियादिली दिखाई उसने पूरे हिन्दुस्तान को अपना कायल बना लिया.

शिंडलर की लिस्ट में 1200 लोग थे और सोनू ने अपनी लिस्ट के 20000 लोगों को घर पहुंचा दिया है और सत्तर हजार के करीब और लोग वेटिंग लिस्ट में है.

ऐसे समय में विदेशों से चंदा प्राप्त करने वाले NGO न जाने कहाँ चले गए किसीको पता नहीं चला. सड़क पर एक भूखा मजदूर बैठकर मरे हुए कुत्ते को खा रहा था, क्या जिन शहरों से मजदूर गुज़र रहे थे उन शहरों के NGO’s का ये दायित्व नहीं था कि उनको पूरे सफ़र के लिए कम से कम खाना ही दे दिया जाता, जबकि इनको होने वाली फंडिंग को ही देखें तो वर्ष 2014-15 के दौरान करीब 3000 NGO’s को 22000 करोड़ की फंडिंग मिली थी और लगातार हर वर्ष इसमें वृद्धि होती रही है.

सोनू सूद भारत के ओस्कर शिंडलर
ट्विटर पर लोग सोनू सूद के लिए प्रेम दिखा रहे हैं

दिल्ली हाईकोर्ट ने एकबार देशभर के NGO’s में से 99% को फर्जी, भ्रष्ट और पैसे बनाने वाला बताया था. सरकारों के बारे में तो कुछ लिखना ही ना लिखने के बराबर है. चुनाव के समय ये इन मजदूरों तक चाहे कैसे भी पहुंचें, पहुँच ही जायेंगे लेकिन अब ट्रेनें रास्ता भटक रहीं है और हजारों की संख्या में मजदूरों के भले के लिए आने वाली बसों को राजनीति के कारण वापस भेजा जा रहा है. आज के समय में जब सरकारों से प्रश्न पूछना ही गुनाह है तो इन गैर-सरकारी संगठनों को स्वयं के होने का औचित्य देना चाहिए, कब तक सोनू सूद ज़िम्मेदारी लेते रहेंगे. ये मजदूरों का पलायन इस सदी के लोगों को कलंकित करता रहेगा|

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