रोटी - Hemmano
समसामयिक

रोटी और मज़दूर : Hemmano Guest Column

रोटी और मज़दूर

मैं पूछता हूँ “रेल्वे ट्रेक पर ये क्या बिखरा पड़ा है?”

आप कहेंगे “ रोटी ।”

मैं कहूंगा “नहीं। इस देश के मज़दूरों की नियति।”

हर साल हजारों राजू, कालू, रफीक, रामेसर, गिरधारी, फ़ैजान, छोटू, सद्दाम अपने घरों से यही रोटी कपड़े में बंधवाकर निकलते हैं। इसी रोटी के लिए भागते हैं। जिम्मेदारियों से भरा झोला लेकर इसी रेलगाड़ी में अपने मुकाम तक पहुंचते हैं। कहने को तो इस झोले में बस दो जोड़ी कपड़े, खाना, चादर, कम्बल, मांबाप, बीवीबच्चों की फोटो, एकाध सरकारी कागज, एक कंघा होता है लेकिन सच बताऊँ तो दुआओं और उम्मीदों से भरा ये झोला दुनिया की सबसे कीमती चीज़ होती है।

किसी को पक्का घर बनवाना है, किसी को शादी में साहूकार से लिया कर्ज चुकाना है तो किसी को मांबाप के हज का सपना पूरा करना है। मन में सुनहरे भविष्य की आस लिए ये टोले शहरों की तरफ निकल पड़ते हैं। बेहतर भविष्य की तलाश में। कुछ शहर में जाकर तिकड़म सीख जाते हैं, साथियों का खून चूसने के लिए सुपरवाईजर साहब, मैनेजर साहब, बाबूसाहब बन जाते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था के लिए सस्ता मानव श्रम उपलब्ध करवाने में भागीदार बनते हैं।

कमेरी कौम का एक उसूल होता है, अपने साथी को अकेला नहीं छोड़ना। यही कारण है कि जहां भी जाते हैं, झुण्ड में जाते हैं। गांव से आते हैं तो झुण्ड में, जाते हैं तो झुण्ड में। इसी झुण्ड से पूंजीपति डरता है, इसी झुण्ड के बिना उसका काम नहीं चलता। इसी झुण्ड को वो आगे बढता देख नहीं सकता।

रोटी और मज़दूर

किसी फ़ैक्ट्री मालिक से पूछना कि जब ‘लेबर’ जाती है, तो कैसी अघोषित मंदी आ जाती है बाजार में?

किसान मज़दूर इस देश की अर्थव्यव्स्था की रीढ है।

आजादी के सात दशक बीतने के बाद भी हमने देश की श्रमशक्ति के लिए कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया है, जिसपर गर्व कर सकें। सरकारें बदलती है, हर साल हजारों करोड़ श्रमिक कल्याण के लिए खर्च होते हैं। धरातल पर मदद नहीं पहुंच पाती। आज भी हम उनको ट्रैनों, बसों में हिकारत से देखते हैं। उनको सभ्य नहीं मानते, क्योंकि वो पूंजीपतियों के बनाए उस ढांचे में फ़िट नहीं होते जिसे हमने Manners का नाम दिया है।

सच्चाई ये है कि भले ही हम कितना भी श्रेष्ठता का दंभ भरें, लेकिन बाबू से लेकर बहुराष्ट्रीय कम्पनी के सी... तक हम सब हैं तो मजदूर ही! भले ही हम कितने ही अच्छे कपड़े पहनकर, कोई भी बड़ी गाड़ी लेकर काम पर जाएं, भले ही हम खुद को कितने ही लोगों का सुपरवाईजर मानें लेकिन वास्तविकता में वो दुनिया का सुपर रिच पूंजीवादी सिस्टम सबको गुलाम बनाकर रखने में विश्वास रखता है। उनके लिए हममें और उनमें कुछ ज्यादा फ़र्क नहीं है। वो ठेकेदार की लेबर कहलाते हैं, हम लोग कॉर्पोरेट्स की। वो पढेलिखे नहीं इसके लिए उनके पास कोई ओहदा नहीं है, लेकिन हम अपनी मजदूरी के बदले साहब, बाबू जैसे तमगे पाकर जिन्दगी भर दंभ पाले घूमते हैं।

मैं गांधी की एक बात से पूरा इत्तेफ़ाक रखता हूँ। उन्होंने मजदूरों के लिए कहा थामेरी नम्र राय में यदि मजदूरों में काफी संगठन हो और बलिदान की भावना भी हो, तो उन्‍हें अपने प्रयत्‍नों में हमेशा सफलता मिल सकती है। पूँजीपति कितने ही अत्‍याचारी हों, मुझे निश्‍चय है कि जिनका मजदूरों से संबंध है और जो मजदूरआंदोलन का मार्गदर्शन करते हैं, खुद उन्‍हें ही अभी इस बात की कल्‍पना नहीं है कि मजदूरों की साधनसंपत्ति कितनी विशाल है। उनकी साधनसंपत्ति सचमुच इतनी विशाल है कि पूँजीपतियों की उतनी कभी हो ही नहीं सकती। अगर मजदूर इस बात को पूरी तरह समझ लें कि पूँजी श्रम का सहारा पाए बिना कुछ नहीं कर सकती, तो उन्‍हें अपना उचित स्‍थान तुरंत ही प्राप्‍त हो जाएगा। दुर्भाग्‍यवश हमारा मन पूँजी की मोहिनी से मूढ़ हो गया है और हम यह मानने लगे है कि दुनिया में पूँजी ही सबकुछ है। लेकिन यदि हम गहरा विचार करें तो क्षणमात्र में हमें यह पता चल जाएगा कि मजदूरों के पास जो पूँजी है वह पूँजीपतियों के पास कभी हो ही नहीं सकती। अँग्रेजी में एक बहुत जोरदार शब्‍द हैयह शब्‍द आपकी फ्रैंच भाषा में और दुनिया की दूसरी भाषाओं में भी है। यह है नहीं बस, हमने अपनी सफलता के लिए यही सहस्‍य खोज निकाला है कि जब पूँजीपति मजदूरों से हाँकहलवाना चाहते हों उस समय यदि मजदूर हाँन कहकर नहींकहने की इच्‍छा रखते हों, तो उन्‍हें निस्‍संकोच नहींका ही गर्जन करना चाहिए। ऐसा करने पर मजदूरों को तुरंत ही इस बात का ज्ञान हो जाएगा कि उन्‍हें यह आजादी है कि जब वे हाँकहना चाहें तब हाँकहें और जब नहींकहना चाहें तब नहींकह दें; और यह कि वे पूँजी के अधीन नहीं हैं बल्कि पूँजी को ही उन्‍हें खुश रखना है। पूँजी के पास बंदूक और तोप और यहाँ तक कि जगरीले गैस जैसे डारवने अस्‍त्र भी हैं, तो भी इस स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ सकता। अगर मजदूर अपनी नहींकी टेक कायम रखें, तो पूँजी अपने उन सब शस्‍त्रास्‍त्रों के बावजूद पूरी तरह असहाय सिद्ध होगी। उस हालत में मजदूर प्रत्‍याक्रमण नहीं करेंगे, बल्कि गोलियों और जहरीले गैस की मार सहते हुए भी झुकेंगे नहीं और अपनी नहींकी टेक पर अडिग रहेंगे। मजदूर अपने प्रयत्‍न में अक्‍सर असफल होते हैं, उसका कारण यह है कि वे जैसा मैंने कहा है वैसा करके पूँजी का शोधन नहीं करते, बल्कि (मैं खुद मजदूर के नाते ही यह कह रहा हूँ) उस पूँजी को स्‍वयं हथियार चाहते है और खुद पूँजीपति शब्‍द के बुरे अर्थ में पूँजीपति बनना चाहते हैं। और इससलिए पूँजीपतियों को, जो अच्‍छी तरह संगठित हैं और अपनी जगह मजबूती से डटे हुए हैं, मजदूरों में अपना दरजा पाने के अभिलाषी उम्‍मीदवार मिल जाते हैं और वे मजदूरों के इस अंश का उपयोग मजदूरों को दबाने के लिए करते हैं। अगर हम लोग पूँजी की इस मोहिनी के प्रभाव में न होते, तो हममें से हर एक इस बुनियादी सत्‍य को आसानी से समझ लेता।

चलिए छोड़िये मजदूर कल्याण की बड़ीबड़ी बातें करके पन्ने भरने से कोई मतलब नहीं जबकि हम धरातल पर उनके लिए कोई ठोस योजना बना पाने में सक्षम नहीं है।

ताजा खबर ये है कि प्रधानमंत्री ने देशवासियों को कोरोना महामारी से बचाने के लिए 23 मार्च 2020 से अनिश्चितकालीन लॉकडाउन घोषित कर दिया। इसका मतलब जो जहाँ था, वो वहीं लॉक हो गया। सब तरह की बस, यात्री रेलसेवा बंद कर दी गई। ऐसे समय में दैनिक मजदूरी करने वाले प्रवासी मजदूरों के सामने रोजीरोटी का भारी संकट आ गया। मालिकों ने उन्हें यह कहकर भगा दिया कि उनके पास फ़िलहाल रोजगार नहीं है।

रोटी-Hemmano

मजदूरों ने सरकार से गुहार लगाई कि और कुछ व्यवस्था नहीं हो पाती है तो कम से कम उन्हें वापस उन्हें अपने घरों तक पहुंचाने के लिए सरकारी व्यवस्था हो जाए। सरकारी मशीनरी शुरुआत से ऐसा करवाने में सफ़ल नहीं हो पाई, लिहाजा मजदूरों ने राज से उम्मीद छोड़कर खुद अपने स्तर पर ही पैदल घर जाना शुरू कर दिया। सरकार ने उनके लिए प्रवासी श्रमिक स्पेशल रेलगाड़ियां भी शुरू की लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।

रास्ते में तमाम तरह की परेशानियां भी आई। कई दर्जन मजदूरों की भूखथकान से मौत हुई। सबने सैंकड़ोंहजारों उदाहरण है, जो अगर यहां लिखूं तो शायद कुछ भी लिखने को जगह ही ना बचे।

इन सबके बीच महाराष्ट्र के औरंगाबाद से एक ऐसी खबर आई जिसने हम सबका चेहरा शर्म से झुका दिया। 5 मई 2020 की रात को रेल्वे ट्रेक पर सो रहे 16 मजदूरों को मालगाड़ी ने कुचल दिया। एक भी जिंदा नहीं बचा। ये मजदूर औरंगाबाद के पास ही एक फ़ैक्ट्री में काम करते थे और रेल्वे ट्रेक के पासपास चलते जा रहे थे, इन्हें उम्मीद थी कि इसी पटरी से ट्रेन जब हमें अपने गांव छोड़ सकती है तो हम पैदल भी पहुंच जाएंगे। चलतेचलते जब थकान ज्यादा हुई तो रेलवे पटरियों को बिछौना बनाकर सो गए। शायद उन्हें लगा कि गांव जाने वाली ट्रेन इस पटरी पर नहीं चल रही तो कोई भी ट्रेन नहीं चलती होगी। 

रोटी-और-मज़दूर

लेकिन उन्हें क्या पता था कि जब देश –दुनिया सब बंद है तब भी पूंजीवादी व्यवस्था चालू है। उनकी तिजोरियों में अब भी उतना ही पैसा आ रहा है जितना पहले आता था। पूंजीवाद का सूरज भी एक दिन डूबेगा। मजदूरों की हुकूमत भी एक दिन आएगी।

 

(प्रकाशित आलेख में व्यक्त विचार, राय लेखक के निजी हैं। लेखक के विचारों, राय से hemmano.com का कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई भी व्याकरण संबंधी त्रुटियां या चूक लेखक की है, hemmano.com इसके लिए किसी तरह से भी जिम्मेदार नहीं है।)

Hemmano-Articlesगंगा सागर

लेखक की सोशल मीडिया प्रोफाइल्स से जुड़ें –

 

One Reply to “रोटी और मज़दूर : Hemmano Guest Column

  1. बहूत खूब सर गजब की लेखनी है आपकी👌👌

कमेंट लिखें