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फिल्मी जगत

रवीन्द्र जैन – कलियुग का सूरदास

वो शख्स बिना आंखों के इस दुनिया में आया, लेकिन जब गया तो लाखों-करोड़ों आंखें नम हुई।

आज हम बात करेंगे रवीन्द्र जैन की। जिनकी गाई चौपाईयाँ हमने बचपन से लेकर आजतक न जाने कितनी बार सुनी होगी।

वो छोटा लड़का जो बचपन से ही शौकिया तौर पर मन्दिरों में जाकर भजन गाया करता था, किसको पता था एक दिन इतना बड़ा हो जाएगा कि हिन्दुस्तान के घर-घर में उसका संगीत गूंजेगा।

रवीन्द्र जैन बचपन से ही आकर्षण के केन्द्र रहे। एकबार रामायण देखते वक्त किसी ने बताया था कि इसमें जिसने संगीत दिया है वो तो ‘जन्मांध’ था। उसी दिन से बस यही ‘जन्मांध’ शब्द दिमाग में घूमने लगा। घर आकर पूछा तो बताया कि ‘जन्मांध’ का मतलब होता है ‘सूरदास’। बड़े-बुजुर्गों ने बचपन से हमें सिखाया कि कभी भी नेत्रहीन का मजाक मत उड़ाना। ओछे नाम से नहीं पुकारना। इसलिए आज भी जब किसी नेत्रहीन का जिक्र आता है तो हम यही कहते हैं कि फलानाराम जी सूरदास थे।

बाद में जब उनका नाम किसी भी पत्र-पत्रिका में देखते तो दिमाग अपने आप सोचने लगता कि इस इंसान ने इतनी महत्वपूर्ण शारीरिक कमी बावजूद भी अपना मुकाम हासिल कर लिया।

28 अप्रेल 1944 को अलीगढ में रवीन्द्र जैन का जन्म होते ही डॉक्टर ने बता दिया था कि बच्चा ताउम्र देख नहीं पाएगा। लेकिन कमाल ये रहा कि मात्र 4 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने मंदिरों में, भजन मंडलियों के साथ रहकर संगीत की पढाई करनी शुरू कर दी। अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से औपचारिक शिक्षा ग्रहण की। वैसे बड़े भाई डी.के. जैन उन्हें बचपन से ही धार्मिक ग्रन्थ, दोहे, चौपाईयां पढकर सुनाते थे।

रवीन्द्र की इच्छा थी कलकत्ता जाकर संगीत सीखने की। पिता ने नैत्रहीन बेटे के सपनों की कीमत समझी और पैसे देकर चाचा के साथ कलकत्ता भेज दिया।

कलकत्ता ही वो जगह थी, जहां से उनके अच्छे दिन शुरू हुए। करीब दस साल वहां रहे। बच्चों को संगीत सिखाते थे। वहीं से किसी निर्माता की नजर में आए और एक रात कलकत्ता से बम्बई की ट्रेन पकड़ ली।

मुम्बई आने के बाद रवींद्र जैन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। यहां काम भी खूब मिला और नाम भी। दौलत-शोहरत दोनों एकसाथ। बॉलीवुड की कई बेहतरीन फ़िल्मों में संगीत दिया। कई गाने जो मैं यहां लिखूंगा तो आप खुद-ब-खुद गुनगुनाने लगेंगे।

उनके कुछ लोकप्रिय गीत

  • गीत गाता चल, ओ साथी गुनगुनाता चल (गीत गाता चल-1975)
  • जब दीप जले आना (चितचोर-1976)
  • ले जाएंगे, ले जाएंगे, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (चोर मचाए शोर-1973)
  • ले तो आए हो हमें सपनों के गांव में (दुल्हन वही जो पिया मन भाए-1977)
  • ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिए (पति, पत्नी और वो-1978)
  • एक राधा एक मीरा (राम तेरी गंगा मैली-1985)
  • अंखियों के झरोखों से, मैंने जो देखा सांवरे (अंखियों के झरोखों से-1978)
  • सजना है मुझे सजना के लिए (सौदागर-1973)
  • हर हसीं चीज का मैं तलबगार हूं (सौदागर-1973)
  • श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम (गीत गाता चल-1975)
  • कौन दिशा में लेके (फिल्म नदियां के पार)
  • सुन सायबा सुन, प्यार की धुन (राम तेरी गंगा मैली-1985)
  • मुझे हक है (विवाह)।

1985 में रवीन्द्र जैन को फ़िल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी मिला। वही अवार्ड जिसे पाना हर संगीतकार के जीवन में एक बड़ा मुकाम होता है। 2015 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार देकर संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान का सम्मान किया।

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पुरस्कार, अवार्ड के अलावा उन्होंने अपने जीवन में सबसे बड़ी चीज़ जो हासिल की वो था लोगों का प्यार। रामानंद सागर ने जब रामायण धारावाहिक बनाने के लिए टीम कास्टिंग  की तो संगीतकार के लिए उनके दिमाग में सबसे पहला नाम रवींद्र का ही आया। जैन ने भी इस नेक काम के लिए सागर को मना नहीं किया।

आगे का इतिहास हम सबको पता है। रामायण हिन्दुस्तान में व्यापक तौर पर देखा जाने वाला सीरियल बना और इसने सफ़लता के ऐसे नए पैमाने गढे जिनके आसपास भी आजतक कोई धारावाहिक नहीं पहुंच पाया। रामायण की सफ़लता ने रवींद्र जैन को इण्डस्ट्री से बाहर घर-घर तक पहुंचा दिया। रामायण का हर एपिसोड “मंगल भवन अमंगल हारी” से शुरू होता था वो रवीन्द्र जैन का गाया हुआ था।

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध गायक के.जे. येसुदास को भी रवींद्र ही बॉलीवुड में लेकर आए। इनके कई गीत येसुदास ने ही गाए हैं। इनकी इच्छा थी कि येसुदास को एकबार अपनी आंखों से देखने की, लेकिन वो कभी पूरी नहीं हो पाई।

9 अक्टूबर 2015 को 76 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उसी मायानगरी में अंतिम सांस ली जिसने उन्हें एक समय पूरे देश का हीरो बना दिया।

रवीन्द्र जैन ने लम्बा तो नहीं लेकिन बड़ा जीवन जीया। खूब मशहूर हुए। नैत्रहीन होते हुए भी जीवन में सबकुछ कमाया जिसके पीछे एक इन्सान भागता है। उनका जीवन सीमित संसाधनों, सीमित शारीरिक क्षमता के साथ संघर्ष करने वाले तमाम लोगों के लिए प्रेरणा है। उनसे जुड़े काफी किस्से हैं जो किसी दिन लिखेंगे।

 

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