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प्रेम, गाली, वेश्यावृति, राजनीति : Hemmano Guest Column

प्रेम, गाली, वेश्यावृति, राजनीति

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लेकिन यह दीग़र बात है कि सभ्यता ने गरीबों को भाषा तो सिखा दी, लेकिन लिपि नहीं सिखाई!

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प्रेम एक ज़रूरी शब्द है। सबका ध्यान भी बड़ी आसानी से खींच लेता है. लेकिन प्रेम महज़ एक शब्द नहीं, एक बहुत व्यापक भाव है।
मैंने कभी लिखा था-
“हज़ारों शायरों ने शे’र लिक्खे और छपवाए
 मैं बैठे बाम पे ये सोचता हूँ रात कब होगी?”
इस शे’र के कई मायने निकाले जा सकते हैं। शायद अदबी जमात के मानकों पर यह खरा न उतरता हो.
मैंने पाया कि इस शे’र को प्रेम से भी जोड़ा जा सकता है, राजनीति से भी और वेश्यावृति से भी.
लेकिन चूंकि लिखे हुए का असली भाव तो लिखने वाला ही जानता है.
सो मैं बता दूं कि मैंने इसे एक असफल शायर की उम्मीद के रूप में लिखा. वह शायर छत पर बैठकर रात होने का इंतज़ार कर रहा है ताकि शब की शांति में वह भी कुछ लिख सके!
ऐसी शांति सबको चाहिए होती है. ऐसी आज़ादी सबको चाहिए होती है. सब लिखना चाहते हैं, पढ़ना चाहते हैं.
लेकिन यह दीग़र बात है कि सभ्यता ने गरीबों को भाषा तो सिखा दी, लेकिन लिपि नहीं सिखाई!
प्रेम, गाली, वेश्यावृति, राजनीति
आपको शायद लगे कि मैं विषय को कहीं से कहीं ले जा रहा हूँ. तो हाँ! मैं ले जा रहा हूँ.
किसी भी लेख की शुरुआती पंक्तियाँ पाठक को आकर्षित करने के लिए, या सीधे शब्दों में उसे बेवकूफ़ बनाने के लिए ही लिखी जाती हैं.
‘प्रेम’ एक आकर्षण पैदा करने वाला शब्द है. ‘वेश्या’ शब्द को समाज ने घिनहा (घृणास्पद) करार दिया है. लेकिन ये वही समाज है, जो चार लोगों के बीच में बनाई गई अपनी इज़्ज़त की ‘टोपी’ रात को उतार देता है.
रात को वह अपना खुला-नँगा सिर और दिमाग लेकर अंधेरे के बीच उजाला ढूंढने निकल पड़ता है, जिससे उसे क्षणिक आनंद की प्राप्ति हो सके.
वर्तमान समय के एक लेखक हैं, उनका एक लेख पढ़ा जिसमें उन्होंने लिखा कि लेखकों को लिखते वक़्त अपशब्द या गालियों का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए.
राही मासूम रज़ा यदि आज जीवित होते तो इन महानुभाव की बात सुनकर अपना “आधा गाँव” बड़ी तेज़ी से उछालकर इनके मुँह पर मारते.
मंटो तो बड़े प्यार से इनके लिए एक कुर्सी और एक टेबल लाते. इन्हें आराम से बिठाते और सामने ठंडा गोश्त, खोल दो, और काली सलवार रख देते!
समाज गालियाँ देता है, खुलेआम देता है. लेकिन एक लेखक वह गालियाँ अपनी कहानियों में क्यों न लिखे?
लेखक को ऐसा करने से रोकने के लिए तो समाज को गालियाँ देना तुरन्त बंद कर देना चाहिए.
राजनीति का हाल उस शायर जैसा हो गया है. जो दो-ढाई शे’र लिखकर खुद को अपनी ज़बान का सबसे बड़ा सुख़नवर समझता हो.
ज़्यादातर प्रेम-कहानियों को जातियाँ मार डालती हैं. राजनीति उन जातियों पर रोटी सेंकती है. और वेश्या के कमरे में जाति खत्म हो जाती है.
वहाँ जाति-उन्मूलन का सबसे धारदार कार्य होता है.
लेकिन एक स्त्री को वेश्या उसकी परिस्थितियां बनाती हैं, समाज बनाता है, और समाज की गन्दी नज़र बनाती है.
जातिवाद, धार्मिक भेदभाव, नस्लभेद, रंगभेद और लिंगभेद. इन सबके ख़िलाफ़ लोगों ने झंडे उठाये हैं, लेकिन यह दुःखद है कि वो झंडे गड़ नहीं पाए!
उठे ही रह गए.
और आलम यह है कि जनांदोलनों से हमने आज़ादी तो ले ली, लेकिन शायद ही कोई आंदोलन इन बुराइयों से हमें आज़ाद करा सके।
आज की राजनीति इन्हीं बुराइयों पर हो रही है. इन बुराइयों पर धारदार भाषण देकर नेता वोट बटोर रहे हैं और जीतते ही उन्हीं बुराइयों के ‘सरगना’ बन जा रहे हैं.
राजनीति प्रेम से होनी चाहिए, बिना प्रेम की राजनीति महज़ वेश्यावृति है. और वेश्यावृति का उन्मूलन समाज ही कर सकता है!
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(प्रकाशित आलेख में व्यक्त विचार, राय लेखक के निजी हैं। लेखक के विचारों, राय से hemmano.com का कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई भी व्याकरण संबंधी त्रुटियां या चूक लेखक की है, hemmano.com इसके लिए किसी तरह से भी जिम्मेदार नहीं है।)
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आयुष चतुर्वेदी

(लेखक वाराणसी के सेंट्रल हिन्दू स्कूल, बीएचयू के छात्र हैं। महात्मा गाँधी पर दिए गए अपने व्याख्यान के कारण जाने जाते हैं। पढ़ाई के साथ-साथ कविताएँ, लेख और व्यंग्य रचनाएँ लिखते हैं।)

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