कुम्भाराम आर्य: राजस्थान का वो नेता जिसने किसानों को उनकी जमीनों का मालिक बनायाकुम्भाराम आर्य: राजस्थान का वो नेता जिसने किसानों को उनकी जमीनों का मालिक बनाया
रोचक किस्से राजनीति के

कुम्भाराम आर्य: राजस्थान का वो नेता जिसने किसानों को उनकी जमीनों का मालिक बनाया : Hemmano Guest Column

कुम्भाराम आर्य: राजस्थान का वो नेता जिसने किसानों को उनकी जमीनों का मालिक बनाया


“जमीन किंकी, बाव-जोत करै बिंकी”

(जमीन किसकी? जो जोत रहा है उसकी।)

राजस्व मंत्री कुम्भाराम ने कागज के पन्ने पर एक लाइन लिखी और लाखों किसान अपनी जमीनों के मालिक बन गए। दादा-परदादा के समय से जोती जा रही जमीनों की खातेदारी मिली। उनके हितों के लिए कानून बने। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 अस्तित्व में आया।

ये कानून बनने से पहले राजस्थान में जागीरदारी प्रथा थी। जमीन को जोतता किसान था, लेकिन मालिकाना हक जमींदार का होता। फसल को उगाता काश्तकार, संभालता काश्तकार, काटता भी काश्तकार लेकिन जब फसल निकलती तो लगान/भेंट/बेगार/बांटा जमींदार लेता, क्योंकि जमीन जमींदार की थी। पुश्तों से जोती जा रही जमीनों पर भी किसान का मालिकाना हक नहीं था। जागीरदारों के बच्चों की शादियां इस आधार पर तय होती कि किसके पास कितने हजार बीघा जमीन है!

कुम्भाराम आर्य: राजस्थान का वो नेता जिसने किसानों को उनकी जमीनों का मालिक बनाया
चौधरी चरणसिंह के साथ कुम्भाराम आर्य – Image Source: Jatland

कुछ शख्स Larger than life होते हैं। चौधरी कुम्भाराम आर्य भी वैसे ही थे। संघर्षों में पले-बढे। छोटी उम्र से ही सामाजिक भेदभाव, छूआछूत के खिलाफ लड़ते रहे। स्वामी दयानन्द की बातें ठीक लगी तो आर्यसमाजी बन गए। दो सरकारी नौकरी भी की। वन विभाग और पुलिस में। रास नहीं आई।

गांधीजी से प्रभावित हुए और अपना संगठन प्रजा परिषद बनाया। कुम्भाराम आर्य की राजनीति जनता के लिए ही बनी थी। पश्चिमी हिन्दुस्तान में आम जनता तक पहुंचे। जागीरदारों के खिलाफ तत्कालीन बीकानेर राज्य की जनता को खड़ा किया। स्टेट ने जेल में डाल दिया तो कुम्भाराम जी ने साहित्य से खुद को निखारा। देश आजाद हुआ तो उनको रिहा किया ।

एक वक्त था जब राजस्थान के पंचायतीराज सिस्टम को देश में सबसे अच्छा माना जाता था। आर्य पंचायतीराज व्यवस्था, सहकारिता के फाउंडर मेम्बर्स में से एक थे।

कुम्भाराम आर्य  ने सक्रिय राजनीति में लगभग 6 दशक से ज्यादा समय दिया। उन तमाम संवैधानिक पदों पर रहे जिन पर रहना आजकल हर राजनैतिक कार्यकर्ता का सपना होता है। अपने अंतिम कुछ साल ग्रामीण इलाकों में पूरी तरह बालिका शिक्षा के लिए समर्पित किए।

कुम्भाराम आर्य: राजस्थान का वो नेता जिसने किसानों को उनकी जमीनों का मालिक बनाया
चौधरी कुम्भाराम आर्य – Image Source Jatland

उनसे जुड़े कुछ किस्से

  • 1946 में कुम्भाराम आर्य जब सरकार के खिलाफ खड़े हुए तो बीकानेर स्टेट ने आदेश दिया कि उनकी सारी चल-अचल सम्पति जब्त कर ली जाए। चल सम्पति के नाम पर कुम्भाराम जी के पास कुछ नहीं था। जो भी चलता, सब जनसहयोग से ही चलता। लेकिन फिर भी सरकारी आदेश तो आदेश ही होता है! तामील करवाने को नायाब तहसीलदार ने अपने एक अधीनस्थ को कुम्भाराम के गांव फेफाना (वर्तमान तहसील नोहर, जिला हनुमानगढ) भेजा। सरकारी कारिंदे ने वहां जाकर देखा तो अचल सम्पति के नाम पर एक कच्चा कमरा था जिसमें उनकी मां और पत्नी रहती थी, कुछ टूटे बर्तन थे, एक बछड़ी थी। वो जब सर्वे करके लौटने लगा तो गांव वालों ने उसका पीछा करना शुरू कर दिया। बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भागा। ग्रामीण इलाकों में कुंभाराम आर्य का प्रभाव इतना था कि तत्कालीन बीकानेर राज्य के आईजी पुलिस चुन्नीलाल ने स्टेट को पत्र लिखा कि “कुंभाराम का तूफान चलता रहा तो ग्रामीण इलाकों को संभालना बड़ा सिरदर्द हो सकता है। उसका ध्येय पट्टेदारों की संपूर्ण समाप्ति लगता है, जिसका प्रमाण सीकर जिले में हुए आंदोलन हैं।”

  • कुम्भाराम आर्य और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत के अच्छे रिश्ते थे। दोनों का ही राजनीतिक जीवन अच्छा रहा। हालांकि वैचारिक रूप से दोनों में जीवनपर्यन्त मतभेद रहे। शेखावत खुद कुम्भाराम द्वारा काश्तकारों के लिए किए गए कामों के प्रशंसक थे। बात तब की है जब भैरोंसिंह जी राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। किसानों की एक मांग को लेकर चौधरी कुम्भाराम आर्य मुख्यमंत्री निवास के आगे भूख हड़ताल पर बैठ गए। ये बात भैरोंसिंह जी को पता लगी। दोपहर में उन्होंने अपनी बेटी को भेजकर आर्य को खाने के लिए घर में बुलाया, लेकिन आर्य डटे रहे। भैरोंसिंह जी ने कहलवाया कि आर्य जी को कह देना अगर उनकी मांगें वाजिब हुई तो राज्य सरकार जरूर गौर करेगी, वो बाद की बात है। लेकिन फिलहाल अगर वो खाने पर अन्दर नहीं आए तो इस घर में आज कोई भी खाना नहीं खाएगा। आखिर कुम्भाराम जी को भूख हड़ताल तोड़नी पड़ी।

  • कुम्भाराम जी हर सरकारी अधिकारी को ‘छोटे बाबू’ और ‘बड़े बाबू’ कहकर ही बुलाते थे। कलक्टर लेवल के अधिकारी को ‘छोटा बाबू’ तो सेक्रेटरी लेवल के अफसर को ‘बड़ा बाबू’ कहते थे। कभी किसी नौकरशाह को ‘साहब’ या ‘अफसर’ कहकर नहीं बुलाया।

  • जब वे सहकारिता मंत्री थे तो कुछ ग्रामीण आकर उनके सचिव से मिले और अपनी समस्या बताई। सचिव ने कानून में खामी का हवाला देते हुए उनका काम करने से मना कर दिया। जब ये बात कुम्भाराम जी तक पहुंची तो उन्होंने तुरन्त अपने सचिव को सम्बन्धित कानून की किताब लेकर आने को कहा और बोला कि इसमें से वो सब आर्टिकल पढकर सुनाओ जिनसे आम जनता का काम रूकता है। सचिव जैसे-जैसे बताता गया कुम्भाराम जी उन लाइनों को लाल पेन से काटते गए। सचिव से बोले “ये कायदे-कानून हमने बनाए हैं तो हम रद्द भी कर सकते हैं। कल सुबह से पहले-पहले आप मुझे जो भी सुधार करने हैं, उनका नोट बनाकर देंगे ताकि मैं विधानसभा में रखकर कानून संशोधन करवा सकूं।”

  • राजस्थान सरकार के एक केबिनेट मंत्री मांगीलाल आर्य जो दलित थे, जब सीकर में सांसद कुम्भाराम जी से मिले तो भावुक होकर उनके पैरों पर गिर गए। कुम्भाराम जी ने कहा “अरे भाई! कोई देखेगा तो कहेगा कि राजस्थान सरकार मेरे पैरों में पड़ी है।” तब मांगी लाल ने कहा, “आर्यजी, आज मैं जो कुछ भी हूँ आप की बदौलत ही हूँ। मैं ही नहीं, सैंकड़ों लोग ऐसे गरीब परिवारों से नेता बने हैं जिन पर आपकी कृपा दृष्टि पड़ी है।”

राष्ट्रीय नेताओं के साथ भी कुम्भाराम जी के अच्छे सम्बन्ध थे। चौधरी चरण सिंह को इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद का ऑफर कुम्भाराम जी के मार्फत दिया था। वो अलग बात है कि चरण सिंह अपने उसूलों पर कायम रहे और बात नहीं मानी। इसके अलावा पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को पंजाब सरकार में मंत्री उनके कहने पर ही बनाया था।

चलते-चलते उनकी ही कही बात एकबार फ़िर:

“एक समय आयेगा जब हम कुआं खोदेंगे तो पानी मिलेगा, लेकिन जागीरदारों के निशान कहीं ढूंढने पर भी नहीं मिलेंगे।”


(प्रकाशित आलेख में व्यक्त विचार, राय लेखक के निजी हैं। लेखक के विचारों, राय से hemmano.com का कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई भी व्याकरण संबंधी त्रुटियां या चूक लेखक की है, hemmano.com इसके लिए किसी तरह से भी जिम्मेदार नहीं है। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।)


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One Reply to “कुम्भाराम आर्य: राजस्थान का वो नेता जिसने किसानों को उनकी जमीनों का मालिक बनाया : Hemmano Guest Column

  1. ऐसी महान शख्सियत को राहुल गांधी ‘कुम्भकर्ण’ बोल गए थे।

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