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इतिहास

जलियांवाला बाग़ 1919

जलियांवाला बाग़

पंजाब में हर साल बैशाखी का मेला भरता है। बैशाखी का बच्चों को उतना ही इंतजार रहता है जितना बचपन में हमें गणगौर के मेले का रहता था।उस दिन रविवार था। मेला भरा था अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में। सब दरबारसाहिब के दर्शन करके मेले में आ रहे थे। काफी संख्या में लोग अंदर थे।
जनरल डायर अंदर घुसा। मशीनगनों से लैस अपने सिपाहियों के साथ। ‘फायर’ कहा और गोलियां चलनी शुरू हुई तो 10 मिनट नहीं थमी। निहत्थे, निर्दोष लोग। कोई कहीं भागा तो कोई बाग के कुएं में जाकर कूदा। भागने वालों के लिए दरवाजा एक था वो भी संकरा। सामने से गोलियां। निर्दयी डायर ने कुएं में कूदे लोगों पर भी ऊपर से गोलियां चलवाई। कितने शहीद हुए, कितने घायल हुए कोई गिनती नहीं! गोलियों से बाग की दीवारें छलनी हो गई। उन दस मिनटों में अंग्रेजी शासन के खात्मे की कहानी लिखी जा चुकी थी।

जलियांवाला बाग़


जनरल डायर ने बाद में माना कि वो भीड़ को बिना एक गोली चलाए भी हटा सकता था। लेकिन उसे जनता में अपना ‘खौफ’ पैदा करना था।
कहते हैं कि ये विश्व इतिहास के सबसे भीषण हत्याकांडों में से एक था। भगतसिंह, उधमसिंह जैसे कई क्रांतिकारी इस नरसंहार से बेहद दुखी हुए। भगत उस वक्त 12-13 साल के  थे, वो 19 किलोमीटर पैदल चलकर जलियांवाला बाग़ आए।
जनरल डायर को 21 साल बाद क्रांतिकारी उधमसिंह ने मौका देखकर लंदन में गोलियों से छलनी कर डाला। हंसते-हंसते फांसी चढ़े।
आज अंग्रेजों का देश से नाम मिट गया। जनरल डायर को इतिहास हत्यारा मानकर याद करता है। उसको अपने किए की सजा उसके घर में ही मिल गई। 
देश कृतज्ञ है आज जलियांवाला बाग़ के शहीदों का, शहीद उधमसिंह का, शहीद भगतसिंह का।

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