महामारी से बचाव के गांधी के सूत्र
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महामारी से बचाव के गांधी के सूत्र – Hemmano Guest Column

कोरोना मानव सभ्यता के लिए भय, अविश्वास और अराजकता लेकर आया है। महामारियों का इतिहास रहा है कि कमोबेश इसी तरह का भय और अविश्वास लेकर आती है, लेकिन हमेशा ही इनका मुकाबला करुणा, विश्वास और मजबूती के साथ करना होता है ।

पिछली सदी का वह काल जिसे हम गांधी युग के नाम से जानते है वह भी इस तरह की महामारियों से भरा रहा। आज से लगभग सौ साल पहले पिछली सदी की सबसे भयानक महामारी ‘स्पेनिश फ्लू’ फैली थी जिसकी अवधि 1918 से 1920 तक थी।  प्रथम विश्व युद्ध खत्म हुआ ही था , सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं न के बराबर थी और जो थी वे अधिकतर चिकित्सक विश्व युद्ध के घायलों के इलाज में जुटे थे। ऐसे में यह दुनिया के लिए विश्व युद्ध से भी घातक सिद्ध हुई। आंकड़े बताते है कि युद्ध में चार करोड़ लोग मरे थे जबकि स्पेनिश फ्लू से विश्व युद्ध के मुकाबले दो गुने अधिक लोग मारे गए थे।

भारत में भी इस बीमारी से लगभग 1.80 करोड़ लोगों के काल कलवित होने का अनुमान है , जो भारत की उस समय की देश की आबादी का लगभग सात फीसदी था। महात्मा गांधी जिन्हें दक्षिण अफ्रीका से भारत आए तीन साल ही बीते थे और उन्होंने अपना सार्वजिनक जीवन आरम्भ किया ही था, वे स्वयं अपने आश्रम में स्पेनिश फ्लू की चपेट में आ गए थे।

गांधी के सार्वजनिक जीवन में महामारियों की सेवा का एक बड़ा अध्याय है।

महामारी से बचाव के गांधी के सूत्र

दूसरे शब्दों में कहे तो “मोहन से महात्मा” बनने की सतत प्रक्रिया बीमारियों में मरीजों की सेवा सुश्रुषा से भी होकर गुजरती है। उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध और बीसवीं सदी का शुरुआती दौर कोढ़ , हैजा, प्लेग, चेचक , पेचिस और स्पेनिश फ्लू के प्रकोप का काल रहा तथा गांधी के कार्यक्षेत्र रहे दक्षिणी अफ्रीका और भारत दोनों जगह गरीबी , अज्ञानता, गन्दगी और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के आभाव के कारण इन बीमारियों का प्रभाव अन्य देशों के मुकाबले कुछ ज्यादा ही रहा।

गांधी जब अफ्रीका में थे तो एक सुबह एक कोढ़ी व्यक्ति उनके घर के सामने पेड़ के पीछे मुंह छिपाता खड़ा मिला। गांधी उसे घर लाए मरहम पट्टी की और अस्पताल ले जाकर भर्ती कराया। गांधी यहीं नहीं रुके , जोहान्सबर्ग के अस्पतालों में कुष्ठ रोगियों के लिए अलग वार्ड बनाने तक का काम उनके प्रयत्नों से सम्भव हुआ। कोढ़ी को देखकर गांधी के मन घृणा के बजाय करुणा उत्पन्न हुई और यही करुणा उनके जीवन के महत्वपूर्ण रचनात्मक कामों की जननी बनी।

आज जब हम कोरोना से पीड़ित और ठीक हो चुके लोगों के साथ समाज के दूसरे लोगों के बहिष्कार का भाव देखते है तो गांधी याद आते है। गांधी ने अपनी आत्मकथा के तीन अध्याय महामारियों के नाम दर्ज किए है। गांधी जोहान्सबर्ग में ही प्लेगग्रस्त भारतीय मजदूरों की बस्तियों में स्वयंसेवको के दल के साथ जाकर सफाई अभियान चलाने से लेकर महामारी से पीड़ित लोगों के लिए अस्थायी अस्पताल बनाने, उनकी चिकित्सा शुरू करने , साथियों के साथ महामारी ग्रस्त लोगों की सेवा करने तक के सभी काम अपने हाथों से करते है।
गांधी की पुण्यतिथि को कुष्ठ निवारण दिवस के रूप में मनाए जाने का मकसद भी उनके जीवन काल में कुष्ठ सहित महामारियों के पीड़ितों के लिए की गई सेवा और कामों को याद करना है।

गांधी के सार्वजनिक जीवन के कामों में स्वच्छता के कार्यक्रम इसी कारण शुरू हुए कि उस दौर में व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का भारी आभाव था। गांधी जहां भी जाते वे स्वयंसेवको की टोली बनाते और साथियों के साथ सबसे पहले सफाई में जुट जाते। उन्हें इस बात की पीड़ा हमेशा सालती रही कि अंग्रेज भारतीयों के सफाई के प्रति आग्रह की कमी के चलते हमेशा भारतीयों को अपमानित करते है और गांधी ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते थे कि अंग्रेज किसी भी मसले पर भारतीयों को कमतर समझ अपमानित करें।

गांधी के प्रवचनों और लेखों में बीमारियों से लड़ने के लिए आहार विहार के नियम जगह जगह आते है। आजकल हम जिस ‘इम्युनिटी’ शब्द का बार बार प्रयोग कर रहे है, गांधी ने पूरे के पूरे प्रवचन और किताब रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए स्वस्थ भोजन के मसलों पर है। वे इन रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करने वाली स्थानीय औषधियों और घरेलू जड़ी बूंटीयो का जिक्र बार बार करते है। 1913 में दक्षिणी अफ्रीका में सत्याग्रह के दौरान गांधी ने ‘की टू हेल्थ’ (स्वास्थ्य की कुंजी) लिखकर स्वास्थ्य सम्बन्धी प्राकृतिक उपचारों पर ध्यान आकर्षित कराया।
गांधी खुद फ्लू से पीड़ित होने के दौरान गंगा बेन को लिखे पत्र में ‘सेल्फ आइसोलेशन ‘ और ‘तरल और पौष्टिक भोजन’ करने की सलाह देते है।

यद्यपि इन सौ सालों में बहुत कुछ बदल गया है। सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बहुत मजबूत हुई है तथा स्वच्छता तथा स्वाथ्य के प्रति चेतना भी जागृत हुई है। इसके बावजूद कोरोना के विरुद्ध संघर्ष में हमें बापू के सूत्र मार्ग प्रदर्शित कर सकते है।

गांधी बीमारों के प्रति दया की नहीं करुणा की बात करते है। दया सक्रिय होती है तो करुणा में बदल जाती है। जब गांधी कहते हैं कि प्रकृति से हमें उतना ही लेने का अधिकार है जितना कम-से-कम पर्याप्त है। तब वे हमें करुणा की भूमिका में जीने की बात कहते हैं। फिर यह भी कहते हैं कि वह जो जरूरत भर लिया, वह भी प्रकृति को वापस करना है। प्रकृति हममें से एक का भी लालच पूरा नहीं कर सकती है, लेकिन जरूरत पूरा करने से वह कभी चूकेगी नहीं ।

गांधी वैराग्यपूर्ण सादा जीवन, सादा भोजन, प्राकृतिक उपचार , स्वावलम्बन आधारित ग्राम्य व्यवस्था, आध्यात्मिक जीवन दृष्टि के माध्यमों से महामारियों से निपटने के रास्ते दिखाते है साथ ही प्रकृति और मानव के संतुलित सम्बन्धों से परिपूर्ण सतत विकास का मॉडल समझाते है। कोरोना विपत्ति के समय जिस तरह से स्वयं को विकसित समझने वाले सभी पश्चिमी महाशक्तियों की बदहाल हालात सामने आई है ऐसे में गांधी का रास्ता ही पूरी दुनियां को दिशा दिखा सकता है।

(प्रकाशित आलेख में व्यक्त विचार, राय लेखक के निजी हैं। लेखक के विचारों, राय से hemmano.com का कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई भी व्याकरण संबंधी त्रुटियां या चूक लेखक की है, hemmano.com इसके लिए किसी तरह से भी जिम्मेदार नहीं है।)

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सुरेंद्र सिंह शेखावत

(एडवोकेट, रिसर्च स्कॉलर ,पोलिटिकल एंड सोशल एक्टिविस्ट)

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