कोरोना के बाद कृषि क्षेत्र: उम्मीद और जरूरत: Hemmano Guest Column
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कोरोना के बाद कृषि क्षेत्र: उम्मीद और जरूरत- Hemmano Guest Column

कोरोना के बाद कृषि क्षेत्र: उम्मीद और जरूरत


 
कोरोना संकट के बाद देश की बदहाल अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए  गांधी के ग्राम स्वराज को आधार बनाकर ग्राम आधारित आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ किए जाने की जरूरत है। भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश  में आज भी कृषि क्षेत्र ही आधी से अधिक आबादी को रोजगार मुहैया करा रहा है, जबकि कॉरपोरेट, इंडस्ट्री तथा सर्विस सेक्टर  भरसक सरकारी प्रयत्नों के बावजूद रोजगार सृजन के मामले में अब भी कृषि क्षेत्र से बहुत पीछे है।
ऐसे हालात में जब करोड़ों मजदूर पलायन करके अपने गांवो और घरों की तरफ लौट गए है तब कृषि और उससे जुड़े  क्षेत्र पर रोजगार सृजन की दृष्टि से ध्यान देने की सर्वाधिक आवश्यकता है।
यद्यपि केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 2019 में केंद्रीय कृषि बजट में कृषि मंत्रालय के लिए अब तक का सर्वाधिक 1,41,174 करोड रुपए का प्रावधान किया। फसल बीमा योजना में सुधार, सोयल हेल्थ कार्ड स्कीम और फसलों के ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म  सरकार की कृषि क्षेत्र में प्रभावी उपलब्धि मानी जा सकती है।
यूनिवर्सल बेसिक इनकम की तर्ज पर बनाई गई किसान सम्मान निधि योजना जिसमें किसान के खातों में ₹6000 प्रति वर्ष सीधा पहुंचाने की योजना भी अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है , जिसका लाभ देश के करोड़ो किसानों को मिल रहा है। इसके बावजूद देश की लगभग 62 फीसदी आबादी को रोजगार देने वाले कृषि क्षेत्र के हालात ज्यादा अच्छे नहीं कहे जा सकते।
सूखा, बेमौसम बरसात, बाढ़, अतिवृष्टि, टिड्डी हमले जैसी प्राकृतिक आपदा झेलने वाला हमारा अन्नदाता तकनीकी कमी, फसल भंडारण की कमी, सिंचाई की समस्या और इन सबसे बढ़कर कृषि जिंसों के भाव की भारी कमी के चलते बदहाल हालत में हैं। विभिन्न आर्थिक सर्वेक्षणो की रिपोर्ट पर गौर करें तो ध्यान में आएगा कि देश में कुल राज्यों में लगभग आधे राज्यों यानी 17 राज्यों में किसानों की औसत आय ₹20,000 सालाना से कम है।
इस संकट के दौर में बहुत थोड़े से प्रयत्नों से विशाल रोजगार सृजन वाले क्षेत्र को मजबूत किया जा सकता है। यहां सबसे पहले केंद्र और राज्य सरकारों को कृषि क्षेत्र से जुड़े रोजगार के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से टास्क फोर्स का गठन करना चाहिए जो इस दिशा में प्रभावी कदम उठाए जाने तय करे। यहां यह भी ध्यान देने योग्य जरूरत है कि इस तरह की टास्क फोर्स या फिर कृषि सम्बन्धी नीति तय करने में नौकरशाहों से मुक्त रखा जाना चाहिए।
कृषि नीति निर्माण में नौकरशाहों के स्थान पर विषय विशेषज्ञों, कृषि वैज्ञानिकों और प्रगतिशील किसानों को शामिल किए जाने की जरूरत है ताकि किसानों के लिए बनने वाली नीतियों का लाभ वास्तविक रूप से धरातल तक पहुंचे।
भारतीय खेती के सामने सबसे बड़ा संकट कृषि उत्पादों के भाव का है। हालांकि वर्तमान सरकार ने लगभग सभी समर्थन मूल्य के अंतर्गत आने वाले कृषि जिंसों पर प्रतिवर्ष समर्थन मूल्य बढ़ाया है।लेकिन फिर भी यह किसान की लागत के मुकाबले पर्याप्त नहीं है। समर्थन मूल्य निर्धारण में लागत के कई घटकों को छोड़ दिया गया है और यह किसान के लिए लाभकारी मूल्य तो कतई नहीं है।
एक उदाहरण के जरिए हम कृषि उत्पादों के भाव के हालात को समझ सकते है ।1970 में गेहूं का समर्थन मूल्य 76 रुपए प्रति क्विंटल था जो 2020 में 26 गुना बढ़कर 1935  रुपए प्रति क्विंटल हो गया। परंतु इस अवधि के दौरान सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में 150 गुना बढ़ोतरी हुई, वहीं कॉलेज के प्रोफेसर के वेतन में 170 गुना बढ़ोतरी और स्कूली शिक्षकों के वेतन में 320 गुना तक बढ़ोतरी हुई है। इस तरह हम न्यूनतम 100 गुना बढ़ोतरी को भी पकड़े तो गेहूं का समर्थन मूल्य ₹7600 प्रति क्विंटल होना चाहिए था।
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यहां  विडंबना की बात है कि एकमात्र किसान ही ऐसा उत्पादक है जो अपने उत्पाद की कीमत खुद तय नहीं कर सकता। देश दुनिया में जो भी उत्पादक हैं वे अपने उत्पाद की कीमत तय करते हैं लेकिन किसान के साथ यह विडंबना है कि उसके उत्पाद की कीमत मंडी के व्यापारी और बिचौलिए तय करते हैं। जब तक किसान को अपने उत्पाद की कीमत तय करने के अधिकार की नीति नहीं बनेगी  तब तक खेती पर यह संकट बरकरार रहेगा।
दूसरी बात समर्थन मूल्य पर हुई खरीद की है। जहां एक तरफ पंजाब जैसे राज्य का सारा गेंहूँ उत्पाद खरीदने के लिए केंद्र सरकार बाध्य है वैसा दूसरे राज्यों में नहीं है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि कुल उत्पादन का केवल 6.5फीसदी कृषि उत्पाद ही समर्थन मूल्य पर खरीदा जाता है। उसमें भी गेहूं और धान के आलावा अन्य जिंसों की खरीद बहुत कम होती है और यह 6.5 फीसदी के आंकड़े में हरियाणा पंजाब का गेंहूँ और धान भी शामिल है जिसके खरीद की बाध्यता सरकार की है। अतः कृषि उत्पादों की कीमत और उनकी खरीद की ठोस नीति बनानी चाहिए।
हमारे यहां पश्चिमी राजस्थान का बारानी काश्तकार लगभग जैविक खेती ही करता है परंतु नियमों एवम प्रमाणन के आभाव में उसके उत्पाद जैविक श्रेणी में नहीं गिने जाते जिसके चलते उसे सामान्य फसलों जैसे भाव ही मिल पाते है। यही नहीं नहरी, नदी और जलकूपों से सिंचित खेती करने वाले किसान को सरकार पानी और बिजली अनुदानित दर पर उपलब्ध कराती है जबकि बरानी इलाके के किसान को इस सब्सिडी का कोई लाभ नहीं मिलता।
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सिंचाई के साधन और सब्सिडी दर पर बिजली पानी वाले किसान के मुकाबले असुरक्षित खेती करने वाले किसान के साथ दुभान्त होती है। अगर बरानी इलाके के किसान को भी उस अनुदान का हिस्सा मिले तो यह किसान जैविक खेती के कीर्तिमान स्थापित कर सकता है साथ ही जैविक खेती के नाम पर उसे उत्पाद की श्रेष्ठतम कीमत भी मिल सकती है।
विभिन्न कृषि उत्पादक क्षेत्रों को क्लस्टर में बांट कर उस इलाके में उत्पादन से लेकर बिक्री तक की चैन को विकसित किए जाने की सख्त आवश्यकता है। क्योंकि जिस तरह की छोटी जोत की खेती का प्रचलन हमारे देश में हैं उस छोटी जोत का किसान इस तरह के क्रियाकलापों में स्वयं सक्षम नहीं है।
सहकारी मॉडल पर अथवा सरकार द्वारा सहायता से विभिन्न कृषि जिंसों के क्लस्टर किसान के उत्पादन से लेकर, भंडारण, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, मार्केटिंग और बिक्री तक की चेन बनाकर किसान को तो उसकी उपज का पूरा मूल्य दिलाया जा सकता है साथ ही इन छोटे बड़े कामों में बड़ा रोजगार सृजन भी किया जा सकता है तथा किसान और उपभोक्ता के बीच राशि के अंतर का बंटवारा बिचौलियों के पास न जाकर विभिन्न स्तरों के कामगारों के मध्य बंट सकता है।
इसी तरह फसल बीमा योजना में भी बहुत  सारे सुधारों के बावजूद अभी भी सुधार की बहुत गुंजाइश है। सामान्य तौर पर सरकारी नीति के अनुसार निजी बीमा कंपनियों को किसानों के फसल बीमा के लिए अधिकृत किया जाता है। पिछले सालों में यह देखने को आया है कि कोई ना कोई बहाना बनाकर यह निजी बीमा कंपनियां किसान को उसका क्लेम का भुगतान करने में अड़चनें डालती है।  इसमें मेरी मान्यता है कि एक तो बीमा संबंधी ठोस नीति बनाई जाए जिसमें इकाई किसान के खेत को माना जाए दूसरा इसे सामान्य बीमा की तर्ज पर कृषक के श्रम का और उसके संभावित उत्पादन से प्राप्त होने वाले लाभ का आकलन करके बीमित राशि का निर्धारण हो।
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वर्तमान समय में फसल बीमा के जरिए निर्धारित की गई क्लेम राशि बहुत थोड़ी है जो कि किसान के वास्तविक नुकसान और उसकी श्रम शक्ति के मुकाबले कुछ भी नहीं है । इस दिशा में सरकार को ठोस नीति बनाए जाने की आवश्यकता है साथ ही निजी बीमा कम्पनियों के स्थान पर सरकारी बीमा कम्पनी को इस क्षेत्र में लगाया जाना चाहिए।
जब हम कृषि आधारित अर्थव्यवस्था खड़ी करने की बात करते हैं तो निश्चित रूप से हमें हमारे गांव का बुनियादी ढांचा और आवश्यक सेवाओं के स्तर को शहरों के मुकाबले करने की भी  आवश्यकता है। इसीलिए स्मार्ट सिटी की तर्ज पर स्मार्ट विलेज तैयार किए जाने की जरूरत है जहां अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य के स्तरीय और गुणवत्तायुक्त संस्थान की जरूरत पड़ेगी ऐसा होने पर ही गांव में कार्यरत सरकारी चिकित्सक, शिक्षक और दूसरे विभाग के कर्मचारी गांव में रहना पसंद करेंगे।
(प्रकाशित आलेख में व्यक्त विचार, राय लेखक के निजी हैं। लेखक के विचारों, राय से hemmano.com का कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई भी व्याकरण संबंधी त्रुटियां या चूक लेखक की है, hemmano.com इसके लिए किसी तरह से भी जिम्मेदार नहीं है।)
 

Hemmano-Articles

सुरेंद्र सिंह शेखावत

(एडवोकेट, रिसर्च स्कॉलर ,पोलिटिकल एंड सोशल एक्टिविस्ट)

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कोरोना के बाद कृषि क्षेत्र

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