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दहेज़ और तलाक : Hemmano Guest Column

दहेज़ और तलाक

दहेज़ के लिए हत्या…… ऐसी खबर हम सबको ज्यादा नहीं तो हफ्ते में चार दिन तो अखबार में पढ़ने को मिल ही जाती है – “दहेज़ के लिए विवाहिता की हत्या , दहेज़ प्रताड़ना से परेशान हो कर विवाहिता ने लगाई फाँसी।” इसके बाद लड़की के ससुराल पक्ष वालों पर सालों केस चलता है , सास – ससुर , देवर – जेठ , पति और कभी – कभी तो ननद – ननदोई तक सब के नाम एफआईआर में शामिल हो जाते हैं। सजा कितनों को मिलती है कब तक परेशानियों का सामना करना पड़ता है क्या पता…

आपने कभी सोचा है इन मामलों कितने मामले वास्तव में दहेज़ के लिए होते होंगे ? खैर… इसके लिए प्रतिशत का निर्धारण करने वाला मैं कोई नहीं होता हूँ और सच बताऊँ तो खुशकिस्मती से मैंने अपनी आँखों से अभी तक एक भी ऐसा दहेज़ प्रताड़ना का केस नहीं देखा जिसमें बात मारने या आत्महत्या करने तक पहुँची हो । हाँ मैंने देखा है कि ये मामले बुने कैसे जाते हैं और एक नहीं कई मामले देखे हैं। और जितने भी देखे हैं यकीन मानिए उनके पीछे वास्तव में दहेज़ की बात थी नहीं।

‌जब लड़की विदा होकर नए घर जाती है तो अपने मायके के परिवार के तौर – तरीके सीख कर जाती है। जिस घर में जाती है उसमें सब अलग होता है। अगर एक पक्ष भी समझदार हो तो सामंजस्य बैठाने की कोशिश की जाती है परंतु आजकल लोग समझदार ना हो कर दंभी हो गए हैं। वे खुद में बदलाव न लाकर सामने वाले को बदलना चाहते हैं। यहीं से टकराव की स्थिति बनती है और बढ़ते – बढ़ते ये कड़वाहट नई दंपति के बीच अपना स्थान बना लेती है।

दहेज़ और तलाक

हर पति यही चाहता है कि उसकी पत्नी परिवार वालों का सम्मान करे, उनकी सेवा करे जिससे पति – पत्नी दोनों को परिवार वालों से यश की प्राप्ति हो। हर पत्नी चाहती है कि पति उसका पक्ष ले, घर में हो रही उथल-पुथल को उसकी नजरों से देखे और कभी उसकी तरफ से अपने परिवार वालों के खिलाफ बोले भी। अगर पत्नी पति का मन रख लेती है उसे अपनी जीवन शैली में आमूल-चूल परिवर्तन करने पड़ते हैं फिर वो पहले वाली वो नहीं रह जाती। अगर पति पत्नी के लिए बोल लेता है तो उनका चूल्हा अलग कर दिया जाता है। यहाँ तक सब फिर भी ठीक है …. ये छोटी – मोटी खरोंचे वक़्त के साथ मिट जाती है। बात आगे तक तब पहुँचती है जब कोई अपनी ज़िद से पीछे ना हटना चाहे … ना परिवार, ना पत्नी और ना ही पति। फिर बात लड़की के द्वारा ही लड़की के मायके तक पहुँचती है। अपनी फूल सी बेटी के मुँह से उसकी दुर्दशा सुन कर माँ-बाप की आत्मा कलपने लगती है, वो आग – बबूला हो उठते हैं और ठीक तभी ये दहेज़ प्रताड़ना वाला विचार जन्म लेता है। बेटी को महीनों पीहर में रख लिया जाता है, कोई लेने आये तो उसे बेज्जत कर खाली हाथ लौटा दिया जाता है इस तरह इस दौरान रिश्तों में इतनी दूरियाँ बढ़ चुकी होती हैं कि उन्हें वापस सामान्य नहीं किया जा सकता। कई जोड़ों का संबंध-विच्छेद इसी स्टेज पर कर दिया जाता है। दहेज़ प्रताड़ना का केस किया जाता है, लड़के वाले दबाव में आते हैं, लड़की को उसका गहना, उसके अगर बच्चे हैं तो उनके नाम उनके हिस्से की जमीन जायदाद, गुजारा भत्ता आदि सब तय करके… दोनों को अलग कर दिया जाता है। अगर इस स्टेज पर उन्हें अलग नहीं किया जाता और समझा- बुझा कर बेमन के समझौते के साथ दोनों पक्षों के पाँच – पाँच आदमियों के सामने लड़की को उसके ससुराल वापस भेज दिया जाय तो अब ससुराल के बाकि आदमी तो बहु को कुछ नहीं कहते, पर खुद का पति और घर की महिलाएं लड़की का जीना इस कदर दुशवार कर देती हैं कि या तो किसी रात लड़की पंखे से लटक कर, जहर खा कर या कुण्ड में कूद कर अपनी ईह लीला समाप्त कर लेती है या फिर ससुराल वालों के नियंत्रण से बाहर हो जाती है जिसके चलते उसके खुद के पति और कई मामलो में घर के अन्य सदस्यों के द्वारा उसके जीवनदीप को बुझा दिया जाता है।

गौर करिए ऊपर लिखी बात पर…. क्या यहाँ किसी को दहेज़ का लोभ दिखा? क्या किसी को मोटर गाड़ी, पैसा, हीरे जवाराहत चाहिए थे?  नहीं…. बात सिर्फ कुछ आधा-एक दर्जन झूठे अहंकारों की थी ।

 

मैं यहाँ ना लड़के वालों का पक्ष ले रहा हूँ ना ही लड़की वालों का… बात बस ये है कि जब कोई जोड़ा आपस में या जब कोई वधु अपने ससुराल के साथ सामंजस्य ना बैठा पाए तो इसकी परिणीति किसी की मौत तक जाय ऐसा जरूरी है क्या? क्यों बात को समय रहते ही नहीं सम्हाल लिया जाता? ना सम्हले तो क्यों दोनों को अलग नहीं कर दिया जाता? वो कौनसी इज्जत की दुहाई होती है जिसे देकर लड़की को पुनः भेज दिया जाता है कभी ना लौटने के लिए और क्या वो इज्जत फिर रह जाती है जब असमय उसकी अर्थी उठती है? क्यों ये दहेज़ प्रताड़ना वाला जहरीला बीज बो देने से नहीं डरते माँ – बाप अपनी बेटी के जीवन में? क्यों सबकी ज़िद इतनी बड़ी हो जाती कि वापस लौटना संभव नहीं होता? विचार कीजियेगा।

 

कहानी का दूसरा पहलू भी है …. जिन महिलाओं की ये दहेज़ प्रताड़ना वाली धमकी काम कर जाती है उनका फिर रूप ही बदल जाता है। बात-बात पर दबाव बनाना, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से समय-समय पर इस धमकी को ताज़ा करते रहना जिसके फलस्वरूप कभी-कभी पति भी मिलते हैं घरों में पँखो पर लटके, नहरों में मरे बाद तैरते हुए, रेलवे ट्रैक पर टुकड़ों में बिखरे हुए या कीटनाशक पी कर अस्पताल के रास्ते में एम्बुलेंसों में दम तोड़ते हुए।

समय बदल रहा है … हमे भी बदलना होगा। अब वो समय नहीं जब आप अपनी आठ – दस बरस की मिट्टी की माधो बेटी को किसी के घर भेज दोगे और वो अनघड़ उनके हिसाब से ढल जायेगी। शादी की औसत उम्र बढ़ी है तो जाहिर है लड़के – लड़कियों की मानसिक उम्र भी बढ़ी है। सबकी अपनी-अपनी कुछ इच्छाएं हैं सब के कुछ सपने, अगर ये पूरे नहीं हो रहे और अगर विवाहित जोड़ा ख़ुशी से साथ में नहीं रह पा रहा तो बिना एक-दूसरे पर लाँछन लगाये अलग होना सीखना होगा।      दहेज़ और तलाक मुझे पता है मैं भारतीय संस्कृति के विरुद्ध बात कर रहा हूँ परन्तु ये तथ्य भी भारतीय संस्कृति में कहाँ चार-चाँद लगाता है कि विश्व में सबसे अधिक दहेज़ हत्या के मामले भारत में होते हैं । इस से तो कम कालिख ही पुतेगी हमारे चेहरों पर अगर तलाक के मामलों की संख्या में कुछ और इज़ाफ़ा हो जाए।

उपाय स्वरूप हमे ये भी सीखना होगा कि नयी वधु को समय दें नए घर के हिसाब से ढलने के लिए, ये भी कि अगर वो नहीं ढल पा रही है तो थोड़ा हम एडजस्ट कर लें, ये भी नहीं हो पा रहा तो बेटा – बहु को ख़ुशी – ख़ुशी अलग कर देना सीखना होगा। हमें ये भी सीखना होगा कि विवाहित बेटी के घर – संसार में कहाँ तक हस्तक्षेप उचित है और ये भी कि अगर बिटिया ससुराल से परेशान लौटती है तो उसे सकारात्मक सलाह दें ना कि क्रोधवश कोई गलत निर्णय लें। असल में हमें अभी बहुत कुछ सीखना होगा फिर से सुखी दाम्पत्य की स्थापना के बारे में।

अगर कोई उपाय काम नहीं कर रहा है , किसी भी तरीके से दंपति के बीच कलह की समाप्ति नहीं हो रही है तो हमे सीखना होगा कि शादी जीवन नहीं जीवन का एक आवश्यक हिस्सा है। पर कभी – कभी शरीर के आवश्यक हिस्से में भी जब केंसर बनने लगता है तो उसे अलग कर दिया जाता है तो जीवन के इस आवश्यक हिस्से को भी अलग कर देने में ही भलाई है।

नीचे कुछ जरूरी आंकड़े एवं तथ्य दिए जा रहा हूँ जो इस तरह के मामलों पर प्रकाश डालते हैं इन पर भी एक नजर डालियेगा –

  • देश में औसतन हर एक घंटे में एक महिला दहेज संबंधी कारणों से मौत का शिकार होती है और वर्ष 2007 से 2011 के बीच इस प्रकार के मामलों में काफी वृद्धि देखी गई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि विभिन्न राज्यों से वर्ष 2012 में दहेज हत्या के 8,233 मामले सामने आए। आंकड़ों का औसत बताता है कि प्रत्येक घंटे में एक महिला दहेज की बलि चढ़ रही है।

  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने साल 1995 के नवंबर महीने में आत्महत्या कर चुकी एक महिला के तीन देवरों और एक ननद की सात साल की कैद की सजा रद्द करते हुए कहा कि हाल के समय में दहेज से जुड़े मामलों में ससुराल के सारे लोगों को आरोपी के तौर पर लपेट लेने की एक प्रवृत्ति बन गई है – न्यायमूर्ति प्रतिभा रानी ने चार लोगों की सजा निरस्त करते हुए यह टिप्पणी दी । दरअसल, अपनी शादी के छह महीने बाद महिला के आत्महत्या करने के मामले में निचली अदालत ने आईपीसी की धारा 304बी के तहत दहेज हत्या के अपराध में इन चारों को सजा सुनाई थी ।

उच्च न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन यह साबित करने में नाकाम रहा कि दहेज के लिए महिला को प्रताड़ित किया गया। इन्होंने कहा कि हाल के समय में सुसराल के सारे लोगों को आरोपी के तौर पर लपेट लेने की एक प्रवृत्ति विकसित हो गई है और यह इस मामले में भी दिखता है।

  • 1995 से 2013 के आंकड़े के अनुसार भारत में वर्ष 2016 में महिला हत्या दर 2.8 प्रतिशत थी जो केन्या (2.6 प्रतिशत), तंजानिया (2.5 प्रतिशत), अजरबैजान (1.8 प्रतिशत), जॉर्डन (0.8 प्रतिशत) और तजाकिस्तान (0.4 प्रतिशत) से अधिक है । इसके अलावा भारत में 15 से 49 वर्ष उम्र की 33.5 प्रतिशत महिलाओं और लड़कियों ने तथा पिछले एक साल में 18.9 प्रतिशत महिलाओं ने अपने जीवन में कम से कम एक बार शारीरिक हिंसा का सामना किया।

  • वर्ष 2004 में धारा 498 A (दहेज़ निषेध क़ानून) के तहत 58121 मामले आये जो बढ़ते – बढ़ते वर्ष 2015 तक 113403 तक पहुँच गए।

ऊपर दिए तथ्यों से साफ़ पता चलता है कि भारत में आज भी बहुत से शादीशुदा जोड़ो की स्थिति शोचनीय है। मैं ये नहीं कह रहा कि सभी मामलों के पीछे दहेज़ की माँग नहीं थी परंतु अगर कुछ के पीछे भी नहीं थी तो क्यों उन कुछ परिवारों को ये सजा मिले और उस से भी महत्वपूर्ण फिर क्यों किसी को अपनी जान गंवानी पड़े? इसी लिए हमें पुनरावलोकन की सख्त आवश्यकता है जिससे हम किसी ऐसे निर्णय पर पहुँचे कि ऐसे मामलों में भारी कमी आए।

अंत में एक बात लिखता जाता हूँ जो सोशल मीडिया पर ही कहीं पढ़ी थी उस पर भी गौर कीजियेगा :- A divorced daughter is better than died daughter . (एक तलाकशुदा बेटी एक मरी हुई बेटी से अच्छी है ।)

आलेख लिखे जाने की तिथि : 10/04/2020

(प्रकाशित आलेख में व्यक्त विचार, राय लेखक के निजी हैं। लेखक के विचारों, राय से hemmano.com का कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई भी व्याकरण संबंधी त्रुटियां या चूक लेखक की है, hemmano.com इसके लिए किसी तरह से भी जिम्मेदार नहीं है।)

दहेज़ और तलाक
– अभिजात चौधरी

विद्यार्थी हैं, समसामयिक विषयों पर आलेख लिखते हैं, किंडल पर एक कहानी संग्रह (जाओ… माफ़ किया) प्रकाशित हो चुका है।

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