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कोरोना योद्धा

(कोरोना योद्धा)

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने अपने 6 वर्षो में देश के सभी वर्गों को व्यापक तौर पर प्रभावित करने वाले दो बड़े फैसले लिए है। नोटबन्दी और लोकडाउन। दोनों को लागू करवाने में बैंक कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। देश के आर्थिक तंत्र को चलाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी लोगों में से एक है बैंक कर्मचारी।

मैं उन्हें बैंकर कहकर उनके योगदान को कम नहीं आंकूंगा क्योंकि बैंकर अपने केबिन में बैठे हैं। जबकि बैंक कर्मचारी कोरोना के खिलाफ असल योद्धा है, पब्लिक डीलिंग तो उन्हें ही करनी है।

नोटबन्दी के समय बैंकों के आगे लोगों की जो लंबी-लंबी लाइनें लगी थी, वैसा ही कुछ लोकडाउन के दौरान हो रहा है। वजह अलग-अलग है। लेकिन बैंक कर्मचारी उस वक़्त भी काम के बोझ से परेशान हुए थे, आज भी हो रहे हैं।
नोटबन्दी की लाइनों में भी देश की बड़ी आबादी (जिसके लिए ‘गरीब’ से बेहतर कोई शब्द हमारे हुक्मरान ढूंढ नहीं पाए) कतारों में लगी थी, अब भी वही लगी हुई है।

देश के जरूरतमंद तबके को लोकडाउन खुलने के बाद मंदी से उबारने के लिए केंद्र सरकार द्वारा 1 लाख 70 हजार करोड़ का राहत पैकेज जारी किया गया, जिसके तहत सबके खातों में DBT माध्यम से पैसे आए हैं। इसके अलावा विभिन्न राज्यों की सरकारों द्वारा भी जरूरतमंदों के खातों में पैसे डाले गए।
इन लोगों में शामिल है गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले, जन-धन खाताधारक महिलाएं, किसान मजदूर वर्ग, विकलांग और वृद्धावस्था पेंशन पाने वाले लोग।

दरअसल जिन लोगों के खातों में पैसे आने थे, उनमें अफवाह फैल गई कि अगर आए हुए पैसे नहीं निकाले गए तो आगे से कोई सरकारी सहायता नहीं मिलेगी। सरकार डाले हुए पैसे भी वापस निकाल लेगी। इस वजह से बैंकों के आगे लोगों की भीड़ जमा होनी शुरू हो गई, जिनमें मेरे हिसाब से असल जरूरतमंद लोग बहुत कम होंगे। (शायद 25 प्रतिशत से भी कम)

सर्वहारा वर्ग के ज्यादातर खाते सरकारी बैंकों, स्थानीय को-ऑपरेटिव बैंकों और ग्रामीण बैंकों में ही है। प्राइवेट बैंक तो सामने वाले के कपड़े-जूते देखकर अंदाजा लगा लेते हैं कि हम इससे कितना कमा सकते हैं!
दूसरे शब्दों में कहूँ तो इसमें कोई दो राय नहीं कि देश के मेहनतकश वर्ग की कमाई का लगभग पैसा सरकारी बैंकों में ही है।

इन कतारों से सबसे ज्यादा बोझ अगर किसी पर पड़ा है, तो वो है सरकारी बैंकों के कर्मचारी। जहां पुलिस नहीं है वहां लंबी कतारों को मैनेज करना, पैसे का लेनदेन, लेनदेन के इतर रोजमर्रा के ट्रांसक्शन्स और सबसे बड़ी चिंता कोरोना से खुद को बचाना।
सरकारी गाइडलाइन्स के अनुसार सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब है एक दूसरे से 1 मीटर दूर खड़े रहना। लेकिन क्या वाकई में जहां पुलिस नहीं है वहां बैंक कर्मचारियों के लिए सबको लाइन में 1-1 मीटर दूर खड़ा करना आसान है? कर्मचारी अपना काम करे या लाइन मैनेज करे?

मैंने पढ़ा था कि अगर सेनेटाइज नहीं किया जाए तो करेंसी नोट में कोरोना के विषाणु 3 से 4 दिन तक जिंदा रह सकते हैं। कागज में लगभग 3 घंटे तक रहते हैं। इस लिहाज से अगर देखें तो रोज सैंकड़ों ग्राहकों से नकदी लेन-देन करने वाले, उनके दूसरे काम करने वाले बैंक कर्मचारियों को कोरोना का खतरा सबसे ज्यादा है। सुबह 9 बजे घर से निकलते हैं तो शाम 6 बजे के लगभग काम निपटता है। ऐसी परिस्थितियों में कभी-कभी चिड़चिड़ापन, मानसिक अवसाद भी हावी हो जाता है।

मेरी पोस्ट पढ़ रहे तमाम दोस्तों से अपील है कि अगर बहुत जरूरी है तो ही खुद या घरवालों को बैंक भेजें। सिर्फ बैलेंस चेक करवाने ना जाएं। सरकार ने जितनी घोषणाएं की है, अगर आप पात्र है तो उतने सब पैसे खाते में आ जाएंगे।

सरकार को सुझाव है कि बैंक कर्मचारी भी कोरोना योद्धा हैं, संक्रमण का खतरा भी ज्यादा है। इन्हें सुरक्षा उपकरण यथा PPE किट, सेनेटाइजर आदि उपलब्ध करवाए जाए।

(फ़ोटो से आप भीड़ का अनुमान लगा सकते हैं।)

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