तमस : मानवता को झकझोरता कालजयी उपन्यास

तमसTitle: तमस
Published by: Rajkamal Prakashan
Release Date: 1 January 2017 (2nd Edition)
Contributors: Bhism Sahani
Genre:
Pages: 310
ISBN13: 978-8126715732
ASIN: 8126715731

तमस : मानवता को झकझोरता कालजयी उपन्यास

आज़ादी से पहले का समय, अंग्रेजों ने भारत के अंतस को कचोटती दीमक साम्प्रदायिकता के घाव को कुरेदना शुरू कर दिया था, दिन रात आस-पड़ोस में रहने वाले, आपस में त्यौहारों पर खान-पान का आदान प्रदान करने वालों के मन में भी एक दूसरे को लेकर शंका हो गयी थी। जिस मौहल्ले में हिन्दू कम थे वहां से पलायन कर रहे थे और जिस मौहल्ले में मुस्लिम कम थे वे भी मुसलमानों के मौहल्ले की ओर भाग रहे थे।

नित-प्रतिदिन मंदिर-मस्जिद में जाकर सबके भले की प्रार्थना करने वाले अब घरों में हथियार इकट्ठे करने लगे थे।

आखिर में लगातार पनपती शंका और भय के माहौल के बीच एक बार फिर से सदियों से चलता आ रहा सामुदायिक युद्ध प्रारम्भ हो जाता है। दूसरे धर्म वालों को दैत्य करार दिया जाता है।

बच्चों से लेकर बूढ़े सभी मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं और पूरा शहर धू-धोकर जलने लगता है। शहर की आग आस-पास के गाँवों में भी फ़ैल जाती है और हिन्दू-मुसलमानों की इस भिड़ंत में सिखों को भी बहुत नुकसान पहुँचता है, सिख भी इस युद्ध में मुसलमानों के खिलाफ भाग लेते हैं। अंग्रेज ऑफिसरों का कहना था कि यह आपका सामुदायिक मसला है इसमें हम दूसरे देश के लोग क्या कर सकते हैं, इसे आप ही सुलझाइये| फिरंगियों की इन बातों को दोनों धर्मों के लोग सहर्ष तर्कसंगत ठहराते हैं और दोष एक दूसरे पर मँढते हैं।

कभी दुकानों से पहचाने जाने वाला शहर फिर लाशों से पहचाना जाता है, शहर में दंगे फसाद 5 दिन तक जारी रहते हैं।

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भीष्म साहनी के लिखे इस उपन्यास को मानवता के दरवाजे पर दस्तक तब कहा जा सकता था जब लोग इसमें दिखाए गए गंभीर शाब्दिक हिंसक दृश्यों को जीवन से दूर भगा पाते। जो कहानी सामान्य हिन्दू-मुस्लिम की होती है वाकई में वैसी ही और बेहद स्पष्ट है। कई वृतांत बेहद दर्दनाक हैं और हिंसा से भरे हुए हैं। लेकिन हम इन्हें हिंसा को प्रेरित करने वाला नहीं मान सकते क्योंकि किसी दंगे फसाद की असली सूरत जो होती है वो इसमें दिखाई गयी है।

साम्प्रदायिकता का दानव केवल मिथ्या श्रेष्ठता दर्शाने के लिए दंगे को प्रेरित करता है लेकिन असल में इस दानव के दिमाग में सवार होने के बाद इंसान की मानवता अपने मानव होने का कारण भूलकर इसी को अस्तित्व स्वीकार कर लेती है

भीष्म साहनी ने तमस में भाषायी दांवपेंच या जटिल भाषा का प्रयोग न करते हुए इसे आम आदमी की भाषा में संयोजित किया है, समाज के विभिन्न वर्गों में फैले मानसिक द्वन्द्वो और एक दूसरे के प्रति बनती - बिगड़ती आकांक्षाओं/शंकाओं  को तारतम्य में लिखा है। राजनीति से लेकर गरीब नत्थू की कहानी भी उतनी ही भाषाई शुद्धता से लिखी गयी है जितनी एक सामान्य पाठक को समझ आ सके।

पात्रों के नाम, घटनाओं का विवरण इतना सजीव है कि पाठक एक ही बार में 300 पृष्ठों के इस उपन्यास को पी जाना चाहता है।

भीष्म साहनी गज़ब के कथा बुनकर हैं, उनकी बुनी हुई कथा में गाँठ की  जरुरत नहीं पड़ती क्योंकि जिन शाब्दिक धागों से ये किस्सों को लिखते हैं वे कभी टूट नहीं सकते।