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महामारी के विकट दौर में भगत सिंह के विचारों की सार्थकता : Hemmano Guest Column

महामारी के विकट दौर में धार्मिक विभेद एवं सरदार भगत सिंह के विचारों की सार्थकता

आज पूरे मुल्क ही नहीं बल्कि विश्व समुदाय के सामने वैश्विक महामारी कोरोना की भयंकर समस्या है। पूरा विश्व इस गम्भीर चुनौती से अपने स्तर पर निपटने एवं जाब्ते के पुख्ता इंतजाम करने में लगा हुआ है। हमारा देश भारत भी इन सबसे अछूता नहीं है। यह मसला इतना अधिक संवेदनशील है कि जनसंख्या के आधार पर पूरी दुनिया में सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमन्त्री तीन बार लोगों से मुखातिब हुए, पूरे देश में लोक डाउन करना पड़ा।

एक विशेष प्रकार की पॉलिटिकल आइडियोलॉजी के लोग इस वक्त मुल्क में गद्दीनशीन है और इस विकट दौर में भी वो अपनी विचारधारा के अनुरूप ही रिएक्ट कर रहे हैं।  उनका मानना है कि उनके विचार को ही सुना, देखा या अपनाया जाना चाहिए। यह घातक है, खासकर इस विपत्ति के दौर में भी।

लोकडाउन अवधि की घोषणा हुई तब जो जहां था, वो वहीं रह गया। यही कारण रहा कि दिल्ली में एक जमात के लोग जो अल्पसंख्यक समुदाय से सम्बन्ध रखते हैं, वो एक जगह फंस गए। लापरवाही का आलम देखिए कि उनके नजदीक थाना था। शहर था दिल्ली, जहां मुल्क की सरकार रहती है वहां भी समय से उनको नहीं निकाला गया। आइसोलेशन में नहीं डाला गया। लापरवाही जब सार्वजनिक हुई तो उन्हें व उनकी कौम को निशाना बनाया गया।

गद्दीनशीन विचारधारा को मानने वाले लोग इस मुल्क में कोरोना लाने वाले मानव बम जैसे शब्दों का इस्तेमाल एक विशेष धर्म के लोगों के लिए करने लगे। उन्हें सोशल मीडिया एवं न्यूज चैनलों की खबरों के आधार पर पूरा मुल्क नफरत से देखने लगा।  उन्हें गद्दार करार दिया जाने लगा। कोई भी बीमार होकर दूसरे को बीमार करना चाहता है, ऐसे सोचने वाले लोग कितने अतिवादी है। महामारी के इस समय में  धार्मिक विभेद निराशाजनक है।

इस पूरे घटनाक्रम पर मुझे सरदार भगत सिंह और उनके साथियों के कौमी एकता के काम याद आते है। उनका मानना था कि मुल्क में सभी धर्मों के लोग, सभी जातियों के लोग, सभी रंगों के लोग पूरी बुनियादी सुविधाओं,अधिकारों के साथ रहने चाहिए। महामारी, अकाल या आपदा के समय राज को चाहिए कि बिना किसी धार्मिक विभेद के मुल्क में सभी धर्मों के लोगों तक मदद पहुंचे, बिना हिन्दू, मुस्लिम, सिख व ईसाई किए।

भारत नौजवान सभा का घोषणापत्र और हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के समय-समय पर प्रकाशित दस्तावेज भगतसिंह और उनके साथियों की विचारधारा को स्पष्ट रूप से बयान करते हैं।

भगतसिंह और उनके साथियों द्वारा 1927 में कीर्ति पत्रिका पंजाबी भाषा के प्रकाशित आलेख ‘धर्मवार फसाद ते उन्हा दे इलाज़ से मुल्क में साम्प्रदायिक सद्भाव को लेकर उनके विचार हमें समझ आते हैं।

भगत सिंह के विचारों की सार्थकता

भगतसिंह लिखते हैं-‘‘भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिंदुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मार-काट इसलिए नहीं की गई कि फलां आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फलां आदमी हिंदू है या सिख है या मुसलमान है। बस किसी व्यक्ति का सिख या हिंदू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिंदुस्तान का ईश्वर ही मालिक है।”

 

1924 में कलकत्ता की साप्ताहिक पत्रिका मतवाला के ‘विश्व-प्रेम’ में भगत सिंह का आर्टिकल छपा। उसमें भगत सिंह ने लिखा है: ‘‘वसुधैव कुटुंबकम जैसे अमूल्य विचार को रचने वाले कवियों के राजा की महानता को बता पाना मानवता के लिए असंभव है।’’ भगत सिंह लिखते हैं कि उनके लिए विश्वप्रेम का असल मतलब सारी दुनिया में समानता से है। हमें समानता के विचार और समता के अर्थ को हर जगह पहुंचाना पड़ेगा और इसके लिए हमें उनपर अत्याचार भी करना पड़े तो हम करें जो इस विचार के खिलाफ हैं।

 

मुल्क में राज कर रहे विशेष विचारधारा के लोगों को विचार करना होगा कि यह देश बुद्ध, गांधी, भगत सिंह, सुभाष, रफी अहमद किदवई जैसे मुहब्बत के लोगों की तासीर का मुल्क है। महामारी के इस दौर में सबको समान भाव से मदद मिलनी चाहिए।

(प्रकाशित आलेख में व्यक्त विचार, राय लेखक के निजी हैं। लेखक के विचारों, राय से hemmano.com का कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई भी व्याकरण संबंधी त्रुटियां या चूक लेखक की है, hemmano.com इसके लिए किसी तरह से भी जिम्मेदार नहीं है।)
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डूँगरसिंह तेहनदेसर

(सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यकर्ता)

 

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