36 kaum ka nara
प्रश्नोत्तरी 

क्यों है प्रसिद्ध 36 कौम का नारा?

36 कौम और राजनीति

कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन होने से थोड़ा पहले राजस्थान में पंचायतीराज चुनाव हो रहे थे, उनसे साल भर पहले विधायकों के लिए चुनाव हो रहे थे। इन दोनों चुनावों के दौरान एक सामान्य मतदाता को एक चीज़ एक जैसी लगी होगी और वो है प्रतिनिधियों द्वारा बोले जाने वाले नारे।

36 कौम

राजस्थान, मध्यप्रदेश व गुजरात के अधिकाँश हिस्सों में जब चुनाव होते हैं तो एक नारा उम्मीदवारों व उनके समर्थकों के मुँह पर जरूर होता है – 36 कौम का साथ।

आम जनता 36 कौम शब्द का अर्थ लगाने की तरफ सोचती भी नहीं, लेकिन इन्हें यह नारा बड़ा पसंद आता है। यह नारा मात्र ही किसी प्रत्याशी के जातिवादी होने, धार्मिक कट्टर होने की पूरी संभावनाओं पर पूरी तरह से रोक लगा देता है, ऐसा मतदाता मानते हैं।

लेकिन हम आज आपको बताएँगे कि ये 36 कौम क्या है?, कौम क्या होती है? और ये 36 कौमें कौनसी हैं?

किसी भी शब्द/वाक्य आधारित खोजबीन करने के लिए हमें सबसे पहले उसका शाब्दिक अर्थ पता करना होता है, शाब्दिक अर्थ से हमें शब्द की उत्पति के सम्बन्ध में देशकाल सम्बन्धी जानकारी मिलती है जो हमारी ऊहापोह में अवश्य ही सहायक होती है।

36 कौम के नारे में अगर हम एक बार के लिए शुरूआती संख्या 36 को छोड़ दें तो हमारे सामने एक बेहद आसान सा शब्द आ जाता है- ‘कौम‘| जिसका स्पष्ट सा अर्थ हम किसी जाति या धर्म से लगाते हैं लेकिन क्या यही सत्य है?

Google सर्च भी हमें यही उत्तर देती है कि कौम शब्द का अर्थ किसी जाति, धर्म से सम्बंधित होता है। लेकिन साथ ही साथ Google हमें एक संकेत और देता है कि इसका सम्बन्ध वंश से हो सकता है।

कौम शब्द के इतिहास में जाएँ तो इस शब्द की उत्पति अरब देशों से मानी जाती है, वहाँ पुराने समय में अलग- अलग जगह फैले कबीलों को कौम कहकर बुलाया जाता था। कालांतर में अरबी लोग भारत में आये तो वो समय बुद्धोत्तर समय था, बुद्धकाल के बाद वहां राजवंश, जातियां और रियासतें जिन्हें अरबियों ने कौम कहा।

36 कौम शब्द में 36 का आंकड़ा कैसे आया-

अरब द्वारा माने जाने वाले कौम शब्द को आज भारत में जाति/ सम्प्रदाय और वंश के नाम पर मान्यता है। लोगों ने इस शब्द को तो अपने जीवन में अपना लिया है लेकिन इसके कारण विकृत होती जानकारी पर उन्होंने विशेष ध्यान नहीं दिया है।

आज चुनावों में 36 कौम शब्द का उपयोग किसी वक्ता के मुँह से भाषण शुरू करते वक़्त शुरू होता है और भाषण ख़त्म होते-होते इस शब्द व संख्या का प्रयोग करीब छत्तीस बार तो हो ही जाता है। लेकिन अगर जनता में से कोई उठकर इन 36 कौमों का नाम पूछ ले तो वक्ता चाहे कितने ही बड़े मंच पर, दो-चार पंखों के सामने क्यों न हो, पसीने निकलने लगते हैं।

तो आखिर यह भ्रम कैसा है या इसका उत्तर कहाँ है कि ये 36 कौमें कौन-कौन सी हैं?

36 कौमों का यह उत्तर भी इतिहास में छिपा हुआ है, इनका मूल अर्थ जाति/सम्प्रदाय नहीं था बल्कि कबीलों से था लेकिन जब अरबी भारत आये तो उन्होंने इस शब्द व संख्या को यहां के राजवंशों से जोड़ दिया।

इतिहास में बुद्ध के बाद के राजवंशों की संख्या 36 बताई जाती है, चंदरबरदाई ने इनकी संख्या 35 बताई है, जेम्स टॉड ने इनकी संख्या 36 बताई है और कुमारपाल चरित में भी इन राजवंशों की संख्या 36 लिखित है।

अतः हम मान सकते हैं कि जिस 36 कौम का उत्तर हम अपनी जातियों, सम्प्रदायों में खोज रहें हैं उनका उत्तर तत्कालीन राजवंशों में हो।

हमने कौम शब्द को अपना लिया है और वर्तमान में इसका अर्थ निःसंदेह जाति/ सम्प्रदाय या वंश के रूप में कर सकते हैं लेकिन इस शब्द के साथ ’36’ के आँकड़े को जोड़ने से इसके इतिहास और वर्तमान में परिवर्तन आ जाता है और यह शब्द ही हमें दुविधा में डाल देता है|

आज जब राजस्थान में केवल अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों की गिनती की जाए तो यह 90 से अधिक होती है तो हम किस प्रकार मान लें कि 36 एक तथ्यात्मक रूप से सही आँकड़ा है।

बुद्ध के बाद के राजवंशों के क्षेत्र अधिकतर राजस्थान, मध्यप्रदेश ही थे अतः इन्ही जगह होने वाले चुनावों में 36 कौम का यह नारा प्रचलित है।

इतिहास के इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर हम 36 कौम के इस शब्द व संख्या को जाति/ सम्प्रदाय से न जोड़कर इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखें तो इसका तथ्यात्मक रूप से ठीक उत्तर मिल जाएगा।

लेकिन अगर इसी नारे को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में न देखकर राजनीति से जोड़कर मानें तो अजमेर-मेरवाड़ा राज्य के समय प्रकाशित डिस्ट्रिक्ट गजेटियर में 1951 की जनसंख्या प्रतिवेदन के अनुसार प्राचीन जाति वर्गीकरण एवं रहन-सहन आदि की पत्रावली संरक्षित है। हालाँकि इस गजेटियर में 37 जातियों को सम्मिलित किया गया है। 36 कौम के नारे से यह आंकड़ा थोड़ा मिलता नहीं है लेकिन कौम शब्द को जाति से जरूर जोड़ देता है। संभव है कि छत्तीस कौम का यह नारा इसी कारण भी बुलंद हुआ हो।

36 कौमें हैं कौनसी? ( हालांकि गजेटियर के मुताबिक़ ये 37 हैं )

अजमेर-मेरवाड़ा गजेटियर में शामिल जातियां –

1. महाजन 2. राजपूत 3. मुस्लिम 4. माली 5. छीपा 6. रंगरेज 7. लोहार 8. तेली 9. सुनार 10. ठठेरा 11. लखारा 12. कुम्हार 13. सुथार 14. ब्राह्मण 15. नाई 16. ढोली 17. दर्जी 18. फकीर 19. चूनगिनार (पत्थर कारीगर) 20. जाट 21. गुर्जर 22. पिनारा/ बुनकर 23. मोची 24. खटीक 25. कीर (केवट) 26. रेगर व चमार 27. भिश्ती 28. धोबी 29. घोसी 30. कसाई 31. कलाल 32. रावत 33. मेहरात 34. बलाई 35. धानका 36. चीता 37. हरिजन।

अब पाठक पर निर्भर है कि वो इन दोनों तथ्यों में से किसे अधिक मानता है?

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