सच होती मैट्रिक्स की कल्पना
फिल्मी जगत

सच होती मैट्रिक्स की कल्पना?

सच होती मैट्रिक्स की कल्पना?


हम अक्सर कहते हैं कि फिल्में समाज का आईना होती हैं लेकिन किस हद तक? अगर कोई फ़िल्म कॉमेडी जेनर है तो हम कह सकते हैं कि इस तरह का रियल लाइफ में कुछ भी नहीं होता लेकिन अगर वही साइंस फिक्शन हो तो क्या वह होना सम्भव नहीं है?

आज फ़िल्म द मैट्रिक्स की बात करेंगे, द मैट्रिक्स फ़िल्म एआई (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) के बढ़ते प्रभाव से खतरे में पड़ी मानव जाति को दिखाती है। 22वीं सदी के मनुष्य 20वीं सदी के एक कंप्यूटर विशेषज्ञ को लेकर जाते हैं और उसे मानव जाति को बचाने वाला मसीहा घोषित कर देते हैं। वे मानते हैं कि उस व्यक्ति में इतनी ताकत है कि वो इन मशीनरियों का मुकाबला कर सकता है।

सच होती मैट्रिक्स की कल्पना

चूंकि मसीहा होने या न होने वाली बात में कोई दम नहीं है लेकिन इसी फिक्शन के दम पर आने वाले कल की तस्वीर इस फ़िल्म ने कुछ ऐसी प्रस्तुत की है जिससे मशीनों से बढ़ते खतरे का व्यापक दृश्य हमारे सामने होगा।

मॉर्फिअस नाम का एक 22वीं सदी का तगड़ा इंसान 20वीं सदी के नीयो को बताता है कि यह दुनिया जैसी दिखाई दे रही है वैसी नहीं है, दरअसल यह माया है और मशीनरियों ने सभी मानवों को कैद कर रखा है लेकिन मानवों को लगता है कि वे आज़ाद हैं और जैसी दुनिया पहले हुआ करती थी वैसी ही है।

तब नीयो पूछता है कि यह सब कैसे हुआ।

मॉर्फिअस उत्तर देता है – 21वीं सदी की शुरुआत में इंसान ने बौद्धिक शक्ति वाली मशीनरियों (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को विकसित किया था तो धीरे धीरे इन्हीं मशीनों ने खुद के कृत्रिम दिमाग के बूते अपनी ताकत इंसानों से ज्यादा विकसित कर ली थी।

उन्होंने इंसानों की दुनिया को तबाह कर दिया लेकिन उन्हें एक माया से भरी दुनिया दी। जिसमें उनका शरीर कैद में रहता और वे खुद असल दुनिया जैसे दिखने वाले सॉफ्टवेयर में महसूस करते कि दुनिया में कुछ भी नहीं बदला है।

सच होती मैट्रिक्स की कल्पना

इन मशीनों ने मनुष्यों को बैटरी के रूप में काम लेना शुरू किया क्योंकि सूरज की रोशनी तब पृथ्वी से खत्म हो गयी थी। मशीनों ने मानवों का कृत्रिम प्रजनन शुरू किया और अब फसलों की जगह मानव खेतों में उगते हैं।

मॉर्फिअस ने इसी तरह की बात नीयो से की। इस बात में सच्चाई या झूठ को ढूंढना कठिन है क्योंकि आने वाला वक़्त कैसा होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है। जैसे आज से 100 साल पहले किसीने इंटरनेट के बारे में भी सोचा नहीं होगा।

एआई के दुनिया भर में बढ़ते प्रभाव से सभी परिचित हैं। इंडस्ट्रीज अब 10 आदमी मज़दूरों के खर्चे के बदले एक मशीन रखना पसंद करते हैं, दुनिया भर में रोबोटिक इंजीनियरिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण नौकरियों में गिरावट का आकलन किया गया है।

अब अलीबाबा जैसी कम्पनी के सीईओ ‘जैक मा’ इन मशीनों को खुद फैसला लेने वाली बना रहे हैं, जो कि बहुत घातक हो सकता है। वे कहते हैं कि दुनिया एआई को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कहती हैं लेकिन हम इसे अलीबाबा इंटेलिजेंस कहते हैं। इंडस्ट्रीज को बढ़ावा देने के लिए अब सभी कम्पनियां इन सस्ती मशीनों को उपयोग में लेना शुरू कर देंगी।

सच होती मैट्रिक्स की कल्पना

माइक्रोसॉफ्ट के बिलगेट्स मानते हैं कि यह पहली बार होगा कि धरती पर आदमी से ज्यादा काम मशीनें करेंगी और जब वे खुद का दिमाग पनपा लेंगी तो शायद मानवों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएंगी।

Stephen Hawking के अनुसार अगर पृथ्वी पर कभी भी मानवों और मशीनों के बीच जंग शुरू होती है तो यह निश्चित है कि जीत मशीनों की ही होगी।

Tesla, SpaceX, OpenAI के फाउंडर एलोन मस्क मानते हैं कि अगर हमने इन मशीनों का उपयोग सीमित नहीं किया और बुद्धिमानीपूर्वक इनसे काम नहीं लिया तो मानवों के लिए सबसे बड़ा खतरा यही बन जाएगी।

एआई के बारे में धारणाएं अलग अलग हैं, लेकिन भविष्य देखने की क्षमता किसीमें भी नहीं है। प्रसिद्ध लेखक युवाल नोआ हरारी कहते हैं कि – एआई के समर्थकों का मानना है कि एआई नौकरियां मिटाएंगी तो कुछ नौकरियां पैदा भी करेंगी लेकिन एक ऐसे संसार में जहां जनसंख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है क्या यहाँ उन नौकरियों की संख्या पर्याप्त होंगी? क्या इसका दावा कोई वैज्ञानिक कर सकता है कि स्वनिर्णय लेने वाली मशीनों में कभी स्वार्थ जैसा गुण-भाव नहीं आएगा? क्या वे मानवों को मिटाने के लिए तत्पर नहीं हो जाएंगी?

विभिन्न शंकाओं का चलते दौर के बीच में एआई विज्ञान दुनिया भर में विकासशील है और निपुणता की ओर लगातार बढ़ रही है।

तो क्या द मैट्रिक्स जैसी फिल्में हमें एक ऐसा भविष्य दिखा रही हैं जो कि कभी भी संभव हो सकता है।

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