भारत में सांप्रदायिक सद्भाव
समसामयिक

राष्ट्रीय एकीकरण व साम्प्रदायिकता

      रूपरेखा

  • प्रस्तावना,
  • राष्ट्रीय एकीकरण की परिभाषा,
  • साम्प्रदायिकता से आशय व खतरे,
  • साम्प्रदायिकता बढ़ने के कारण,
  • राष्ट्रीय एकीकरण में बाधक तत्व,
  • वर्तमान में राष्ट्रीय एकीकरण व साम्प्रदायिक सद्भावना की महती आवश्यकता,
  • साम्प्रदायिक सद्भाव के उदाहरण,
  • राष्ट्रीय एकीकरण एवं साम्प्रदायिक सौहार्द्र बढाने के उपाय,
  • उपसंहार –

 

प्रस्तावना–

वर्तमान में राष्ट्रीय एकता व साम्प्रदायिक सौहार्द्र को लेकर काफी विवाद चल रहा है। भारत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखा जाए तो प्राचीन काल में यहाँ अनेक गणराज्य थे और उनमें भौगोलिक, धार्मिक व सांस्कृतिक कारणों से पारस्परिक सहयोग व एकता थी और उसी एकता के कारण वो गणराज्य संघ अजेय थे।

सांप्रदायिक सद्भाव

परन्तु वर्तमान में धार्मिक आस्था, भाषावाद, जातिवाद, वर्गवाद,सांस्कृतिक नस्लवाद एवं क्षेत्रवाद आदि का राजनीतिक कुचक्र चलने से राष्ट्रीय एकता की जो स्थिति है वो सारे राष्ट्र के लिए हानिकारक सिद्ध हो रही है। ऐसी विकट परिस्थिति में हमें आवश्यकता है तो केवल राष्ट्र को एकीकृत रखने की व साम्प्रदायिक सद्भाव बढ़ाने की। परन्तु कुछ समाजकंटकों के कारण साम्प्रदायिक सद्भाव बढ़ाने में कठिनाईयां आ रही हैं। आजकल साम्प्रदायिकता की विकराल समस्या भी सामने आ रही है। अगर हमारे देश को हमें चरम विकास तक लेकर जाना है तो भारतीय जनतंत्र से साम्प्रदायिकता को हटाना होगा और हमारे देश को एकीकरण की दिशा में मोड़ना होगा जिससे इस देश का भविष्य और उज्ज्वल हो सके।

संक्षेपतः भारत में जब-जब राष्ट्रीय एकता की न्यूनता रही, तब-तब विदेशी शक्तियों ने यहाँ अपने पैर जमाने की चेष्टा की और हमारी आपसी फूट का उन्होंने पूरा फायदा उठाया। याबी स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में अनेकता में एकता का स्वर गूँजने लगा है। उसकी रक्षा के लिए आज राष्ट्रीय एकता की महत्ती आवश्यकता है।


राष्ट्रीय एकीकरण की परिभाषा –

हमारा देश विभिन्न संस्कृतियों का देश है, जो समूचे विश्व में अपनी एक अलग पहचान रखता है। अलग-अलग संस्कृति और भाषाएं होते हुए भी हम सभी एक सूत्र में बँधे हुए हैं तथा राष्ट्र की एकता व अखंडता को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए तत्पर रहते हैं।

राष्ट्रीय एकीकरण का अर्थ होता है, राष्ट्र के सब घटकों में भिन्न-भिन्न विचारों और विभिन्न आस्थाओं के होते हुए भी आपसी प्रेम, एकता और भाईचारे का बना रहना ।

communal harmony in india

राष्ट्रीय एकता में केवल शारीरिक समीपता ही महत्वपूर्ण नहीं होती बल्कि उसमें मानसिक, बौद्धिक, वैचारिक और भावात्मक निकटता की समानता होती है।

आज हमारे देश में सैकड़ों भाषाएं बोली जाती है, उत्तरी भारत सांस्कृतिक व भौगोलिक रूप से भिन्न है परन्तु वो एक जिस कड़ी से जुड़े हुए हैं, उसे राष्ट्रीय भावना कहते हैं।

राष्ट्र शब्द केवल किसी देश का प्रतीक नहीं है, बल्कि राष्ट्र से राष्ट्रीयता की भावना उजागर होती है।

जब स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे देश में लोकतंत्र की प्रतिष्ठा हुई तब शासन –व्यवस्था में किसी जाति-विशेष या धर्म-विशेष को प्रमुखता न देकर सभी देशवासियों को समानता का अधिकार दिया गया और राजनैतिक, वैचारिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता तथा समानता का प्रतिपादन कर राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया गया।

आज जब हम किसी अपरिचित देश में अपने राष्ट्र के किसी अपरिचित व्यक्ति को पाते हैं तो प्रसन्न होकर उससे मिलते हैं। यही भावना समूचे राष्ट्रीय एकीकरण का प्रतीक है।


  • साम्प्रदायिकता से आशय व उससे खतरे –

साम्प्रदायिकता का अर्थ है अपनी पूजा-पाठ, उपासना-विधियों, खान-पान, रहन-सहन के तौर तरीकों, जाति-नस्ल आदि की भिन्नताओं को ही धर्म का आधार मानना तथा अपनी मान्यता वाले धर्म को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी मान्यता वाले धर्म को निकृष्ट समझना, उनके प्रति नफरत द्वेष-भाव पालना और फैलाना। अपने लिए श्रेष्ठता और दूसरों के प्रति निकृष्टता का यही भाव हमारे सामाजिक विघटन का मूल कारण है, क्योंकि इससे आपसी सामाजिक रिश्ते टूटते हैं। परस्पर शंका-अविश्वास के बढ़ने से सामाजिक विभाजन इतने अधिक हो जाते हैं कि अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की बस्तियाँ एक दूसरे से अलग-थलग होने लगती हैं। यह अलगाव कई आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक कारणों से जुड़कर देश के टूटने का कारण बनता है।

हमारा देश व समाज एक बार इस प्रकार की अलगाववादी प्रवृत्ति का शिकार होकर विनाश के अत्यंत दुखांत दौर से गुज़र चुका है। क्या हम उसे फिर से दोहराया जाना, देखना या भोगना चाहते हैं?

Violence

यदि नहीं तो फिर धर्म के आधार पर राज्य और राष्ट्र की बात जिस किसी भी धर्म वाले क द्वारा क्यों न कही जाती हो, हम उसका डटकर विरोध क्यों नहीं करते?

सोचिए, क्या धर्म के नाम पर राष्ट्र की बात कहने या उसका समर्थन करने से अंततः हम उस मान्यता के ही पक्षधर नहीं बनते, जिसमें धर्म को अलग राष्ट्र का आधार माना गया था और जिस मान्यता के कारण भारत विभाजित हुआ था।

जब धर्म के नाम पर राष्ट्र बनेगा तो नस्ल, जाति, भाषा आदि के आधार पर राष्ट्र बनने से कौन रोक सकेगा? कैसे रोक सकेगा?

तो फिर, इतनी विविधता वाले वर्तमान भारतीय राष्ट्र की तस्वीर क्या होगी?

धर्माधारित राज्य –राष्ट्र की माँग करना भारतीय समाज एवं राष्ट्र के विघटन का आह्वान है और वास्तविकता तो यह है कि धर्माधारित राष्ट्र या राज्य की माँग के पीछे अनेक आर्थिक, राजनीतिक निहित हित साधने के लक्ष्य छिपे होते हैं।


  • साम्प्रदायिकता बढ़ने के कारण –

आज समाज में साम्प्रदायिकता जिस हद तक फिली है उसके अनेक कारण हैं।

धर्मों के उन्माद फैलाकर सत्ता हासिल करने की प्रत्येक कोशिश साम्प्रदायिकता को बढ़ाती है, चाहे वह कोशिश किसी भी व्यक्ति समूह या दल के द्वारा क्यों न होती हो। थोक के भाव वोट हासिल करने के लिए धर्म-गुरुओं और धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल लगभग सभी दल कर रहे हैं। इसमें धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले राजनीतिक दल भी शामिल हैं।

इन दलों ने चुनावों में साम्प्रदायिक दलों के साथ समझौते भी किए हैं, सत्ता में इनके साथ साझीदारी की है। यदि धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले दलों ने मौकापरस्ती की यह राजनीति ना की होती तो धर्म –सम्प्रदाय आधारित राजनीति करने वालों को इतना बढ़ावा हरगिज नहीं मिलता। जब धर्म-सम्प्रदाय की राजनीति होगी तो साफ है कि साम्प्रदायिकता अधिक ताकतवर बनेगी।

communal riots india

पूंजीवादी शोषणकारी वर्तमान व्यवस्था के पोषक और पोषित वे सभी लोग साम्प्रदायिकता बढ़ाने में सक्रिय साझीदार हैं, जो व्यवस्था बदलने और समता एवं शोषणमुक्त समाज-रचना की लड़ाइयों को धार्मिक-साम्प्रदायिकता का उन्माद उभाड़कर दबाना और पीछे धकेलना चाहते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि धर्म-सम्प्रदाय की राजनीति के अगुवा चाहें वे हिन्दू हों, मुसलमान हों, सिख हों, ईसाई हों या अन्य किसी धर्म को मानने वाले, आम तौर पर वही लोग हैं, जो वर्तमान शोषणकारी व्यवस्था से अपना निहित स्वार्थ साध रहे हैं। पूँजीपति, पुराने राजे-महाराजे, नवाबजादे, नौकरशाह और नये-नये सत्ताधीश, सत्ता के दलाल और समाज का प्रबुद्ध वर्ग, जिससे यह अपेक्षा की जाती है कि साम्प्रदायिकता जैसी समाज को तोड़ने वाली दुष्प्रवृत्तियों का विरोध करेगा, आज की उपभोक्ता संस्कृति का शिकार होकर मूकदर्शक बना हुआ है, अपने दायित्वों का निर्वाह करना भूल गया है।

साम्प्रदायिक हिंसा का मुख्य कारण किसी धर्म के द्वारा अन्य धर्म के प्रति घृणा रखना होता है।


  • राष्ट्रीय एकीकरण में बाधक तत्व-

इतना सब कुछ होने के बाद भी आज हमारे देश में राष्ट्रीय एकता का प्रश्न उतना ही प्रबल बना हुआ है, क्योंकि आज भी देश की सीमाओं पर शत्रुओं की छल कपटमय कुचालें दिखाई दे रही हैं। कुछ बड़े राष्ट्रों की खुफिया एजेंसियां आतंकवाद को बढ़ावा दे रही है और कुछ देश धर्म के नाम पर भारत की एकता को खंडित करने की चेष्टा कर रहे हैं। कहीं सांप्रदायिक दंगे करवाए जाते हैं, तो कहीं जातिगत विद्वेष भड़काया जाता है। कुछ कट्टर धार्मिक दृष्टिकोण वाले लोग हमारी सरकार एवं आम जनता के साथ छद्म-युद्ध चला रहे हैं।

कुछ राष्ट्रविरोधी संगठन पूर्वोत्तर व पश्चिमोत्तर भाग में भय का वातावरण बना रहे हैं।

इतिहास गवाह है कि भारत में जब-जब एकता की कमी रही, तब-तब विदेशी शक्तियों ने यहाँ अपने पैर जमाने की कोशिश की और हमारी आपसी फूट का उन्होंने फायदा उठाया।

दूसरी तरफ नक्सलवाद राष्ट्रीय एकीकरण में बहुत बाधक साबित हो रहा है।नक्सली अपनी माँगो को लेकर हिंसा पर उतारू रहते हैं जो कि बेहद गलत है और देश में एकीकरण के प्रयास को धत्ता साबित करते हैं।

जम्मू कश्मीर के अलगाववादी संगठन आये दिन हिंसा पर उतर आते हैं, हालांकि 2019 में अनुच्छेद 35(A) व370 में संशोधन करने के बाद वहां कुछ शांति की कामना कर सकते हैं या मान सकते हैं कि भारतीय कानून को धत्ता बताने वाले अब कुछ नियंत्रण में है। (गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर को अब एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया है और अगस्त के बाद से 2020 जनवरी तक वहाँ धारा 144 लगाई हुई है।)

देश के विभिन्न हिस्सों में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर भी झड़पें व हिंसा हुई, हालांकि सरकार के अनुसार इस कानून से वर्तमान के नागरिकों को कोई ठेस नहीं पहुँचेगी। सरकार ने बताया है कि इन कानूनों से पड़ौसी देशों (पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश) से शरणार्थी के रूप में केवल धार्मिक प्रताड़ित स्वीकार किये जायेंगे और इन देशों में धार्मिक प्रताड़ना से केवल वही जूझ रहे होंगे जो कि गैर-मुस्लिम हैं।लेकिन दलीलों के रूप में लोग भविष्य में कभी आने वाले कानून ‘राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर’ के बारे में कहते हैं जिससे भारत का अमान्य नागरिक साबित होने वाले व्यक्ति को देशनिकाला दिया जाएगा।

हाँ, इस बात को संज्ञान में रखना जरूरी है कि वर्तमान में भारत में रह रहे मुस्लिमों को कोई आँच न आने पाए।

मैं राष्ट्रहित के लिए शरणार्थियों के कानून में कुछ हद तक स्वीकृति दे सकता हूँ परन्तुमेरे हिसाब से वर्तमान निवासियों की निकासी के संदर्भ मेंकोई कानून ना बने तो देश की अखण्डता में कोई परेशानी ना हो।

मैं यही चाहता हूँ कि देश के हर भाग को हिन्दू-मुस्लिम, भाजपा-कांग्रेस और केंद्र-राज्य की गुत्थियों से बाहर निकाला जाए।

‘सीएए’ को हटाओ और नहीं हटने देंगे के नारों के बीच युवाओं की आकांक्षाएँ, विकास की उम्मीद और राष्ट्रीय एकता के प्रयास सभी दम तोड़ रहे हैं और ऐसी अराजक स्थितियों में देश के एकीकरण को भी गम्भीर खतरा है।

आज देश राजनेता और राजनेताओं के जंजाल में फंसा हुआ है और इसके समक्ष राष्ट्रीय एकता से अधिक अराजकता के विकल्प मौजूद हैं।


  • वर्तमान में राष्ट्रीय एकीकरण की महत्ती आवश्यकता –

प्रायः देखा गया है कि जब भारत पर विदेशी या बाहरी शत्रुओं का आक्रमण हुआ तो सारे देश में एकता की लहरें सी उठ गई थीं। चीनी व पाकिस्तानी आक्रमणों के अवसर पर जनता ने सोना-चाँदी, आभूषण, धन आदि सब-कुछ अपनी सामर्थ्य के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में दान कर दिया था, लेकिन इसके बाद आंतरिक-विभेद, प्रांतवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता व आतंकवाद आदि विभिन्न कारणों से देश की एकता को हानि पहुँचाई गयी। परन्तु हमें अभी भी सावधान रहना चाहिए। लोकतंत्र की स्थिरता, स्वतंत्रता की रक्षा के लिए व राष्ट्र के सर्वतोमुखी विकास के लिए राष्ट्रीय एकता की महत्ती आवश्यकता है। आज विभिन्न धर्मों के आपसी द्वेष के कारण कट्टर साम्प्रदायिकता फैल रही है।

राष्ट्रीय एकीकरण एवं साम्प्रदायिकता

हमें इस समय साम्प्रदायिक सद्भाव की अत्यंत आवश्यकता है अन्यथा यह देश एक बार फिर धर्म के नाम पर निर्दोषों का रक्त सड़कों पर व घरों में पड़ा देखेगा।

पूर्व में हम साम्प्रदायिक तनाव का भयंकर रूप देख चुके हैं, कई कट्टर लोग अपने धर्म की रक्षा की कोशिश करते हुए किसी अन्य धर्म की भावनाओं को आहत करते हैं।

हमें इन सभी समस्याओं से निजात पाकर देश को अखंडता की ओर अग्रसर करना चाहिए।

वास्तविकता तो यह है कि अगर राष्ट्र में साम्प्रदायिक सद्भावना होगी और धर्म में राजनीतिक गतिविधियां बंद होंगी तो ही देश एकीकृत होकर विकास करेगा।

साम्प्रदायिकता पर शायर दीपक शर्मा की एक शायरी –

मेरी साँसों में यही दहशत समायी रहती है
मज़हब से कौमें बँटी तो वतन का क्या होगा ।

यूँ ही खिंचती रही दीवार ग़र दरम्यान दिल के
तो सोचो हश्र क्या कल घर के आँगन का होगा ।

जिस जगह की बुनियाद बशर की लाश पे ठहरे
वो कुछ भी हो लेकिन ख़ुदा का घर नहीं होगा ।

मज़हब के नाम पर कौ़में बनाने वालों सुन लो तुम
काम कोई दूसरा इससे ज़हाँ में बदतर नहीं होगा ।

मज़हब के नाम पर दंगे, सियासत के हुक्म पे फितन
यूँ ही चलते रहे तो सोचो , ज़रा अमन का क्या होगा ।

अहले -वतन शोलों के हाथों दामन न अपना दो
दामन रेशमी है देख लो फिर दामन का क्या होगा ।

अतः भारत के विकास एवं उज्ज्वल भविष्य की दृष्टि से राष्ट्रीय एकीकरण व साम्प्रदायिक सद्भाव महत्ती आवश्यकता है।


  • साम्प्रदायिक सद्भाव के उदाहरण –

एक तरफ जहाँ समाज के कई वर्गों में साम्प्रदायिकता फैली हुई है तो दूसरी तरफ समाज में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिन्होंने सद्भावना को फैलाया है। पूर्व में महात्मा गाँधी से लेकर आज के एपीजे अब्दुल कलाम तक साम्प्रदायिकता ज़ोर नहीं पकड़ पाई। ये दोनों कौमी एकता के बहुत बड़े उदाहरण हैं और रहेंगे।

इतिहास में झाँकें तो हमारे समक्ष सबसे बड़ा उदाहरण सन्त कबीर का है जिन्होंने पूरी निडरता से समाज की दोनों मज़हबों हिंदुओं व मुसलमानों की कुरीतियों को दूर कर सद्भाव फैलाने का प्रयास किया।

कबीर जी कहते हैं-

“हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,

आपस में दोउ लड़ी लड़ी मरे, मरम न कोई जाना।“

कबीर के अलावा भी अनेक महापुरुषों जैसे कि स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों ने भी सद्भावना के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया था।

सभी महापुरुषों के अनुसार मज़हब की पालना का अर्थ यह नहीं होता कि दूसरे धर्मों से द्वेष पाले।

साम्प्रदायिक सद्भावना की वर्तमान काल में भी बहुत उल्लेखनीय घटनाएं हैं।

सद्भावना के उदाहरण राजस्थान में भी देखने को मिलते हैं।

राजस्थान के बीकानेर जिले की लूनकरनसर तहसील के ‘धीरदान’ नामक गाँव को सांप्रदायिक सद्भाव की बड़ी मिसाल मान सकते हैं। यहाँ के निवासी लोगों ने हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई अवधारणा को अपनाया है।इस गाँव में प्रसिद्ध सूफी संत शेख फरीद की दरगाह है परन्तु गाँव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं है।

अतः इस दरगाह की व्यवस्था हिन्दू ही संभालते हैं और उत्सवों, कार्यक्रमों पर दरगाह की जियारत करते हैं।

इस गाँव में मौजूद हर वाहन पर “दादा शेख फरीद- धीरदान” लिखा हुआ होता है।

राजस्थान में लोकदेवता को मानने वालों में दोनों सम्प्रदाय के लोग हैं। लोकदेवता रामदेव जी, गोगाजी व नौगजा पीर सद्भावना के सुंदर उदाहरण है जिन्हें दोनों समुदायों के आस्तिक पूरी निष्ठा से मानते हैं।

साम्प्रदायिक सद्भाव बनाने में न केवल पुरुषों की भूमिका रही है बल्कि महिलाओं की भूमिका भी अहम रही है।

कई मुस्लिम महिलाओं के नाम विख्यात हैं जैसे राज्यसभा की उपसभापति रही नज़मा हेपतुल्ला, अभिनेत्री शबाना आज़मी, लेखिका इस्मत चुग़ताई, कुर्रतुल ऐन हैदर –ये सभी नाम साझी संस्कृति की संवाहक परम्पराको दर्शाते हैं।

इन्होंने साझी संस्कृति के अंदाज को कुछ यूँ जिया –

“बच्चा मुसलमान के घर होता है, गीत कृष्ण कन्हैया के गाये जाते हैं।“

“मुसलमान बच्चे बरसात की दुआ माँगने के लिए मुँह नीला-पीला किये गली-गली टिन बजाते हैं, साथ मिलकर चिल्लाते हैं ; हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की।“

कुर्रतुल ऐन हैदर ने बखूबी लिखा है कि “ मुसलमान पर्दानशीं औरतें जिन्होंने ताउम्र किसी गैर मर्द से बातचीत नहीं कि, जब ढोलक लेकर बैठती हैं तो लहक- लहक कर अलापती हैं –“भरी गगरी मेरी ढलकाई तूने, श्याम हाँ तूने।“

बनारस पूरे विश्व में अपनी धार्मिक आस्था के साथ-साथ साझी संस्कृति के लिए भी मशहूर है। यह बनारस की माटी का ही प्रभाव है कि प्रख्यात शहनाई वादकबिस्मिल्लाह खां ने बनारस में गंगा तट पर अवस्थित मंगला गौरी मन्दिर से शहनाई वादन की शुरुआत की थी और वे मुहर्रम के गमीं अवसर पर भी उतनी ही शिद्दत के साथ शहनाई बजाया करते थे।

इसी बनारस की डॉ. नाहिद आब्दी मुस्लिम धर्मानुयायी होने के बावजूद वेदों की ज्ञाता है और संस्कृत की सेवा में लगी हुई हैं। संस्कृत में मास्टर डिग्री लेने के बाद उन्होंने वेद जैसे कठिन विषय पर पीएचडी की है।

केरल विश्वविद्यालय की संस्कृत वेदांत की मुस्लिम लड़की रहमत ने वर्ष 2009 में सबको पीछे छोड़ते हुए प्रथम स्थान हासिल किया।

हाल ही में दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम साम्प्रदायिक सद्भावना के बड़े परिचायक है।

इनको हिन्दू व मुस्लिम दोनों अपना आदर्श मानते हैं।

सद्भाविक उदाहरणों के द्वारा हम सद्भाव के महत्व को समझ व समझा सकते हैं।

  • राष्ट्रीय एकीकरण व साम्प्रदायिक सद्भाव को बढाने के उपाय

  • साम्प्रदायिकता को उभाड़ने वाली किसी भी दुष्प्रवृत्ति के शिकार न हम खुद हों और समाज में साम्प्रदायिकता उभाड़ने वाली कोशिश के खिलाफ खड़े हैं, फिर चाहे ऐसी कोशिश हिंदुओं के द्वारा हो या मुसलमानों के द्वारा हो।

केंद्र व राज्य सरकारों का कोई भी प्रतिनिधि किसी भी धर्म के अनुष्ठान में राज्य व शासन के प्रतिनिधि के रूप में शामिल न हो, न ऐसे अनुष्ठानों को राज्य द्वारा किसी प्रकार की विशेष सहायता मिले, और न ही राजकीय उद्घाटन, शिलान्यास आदि के आयोजन किसी धर्म विशेष के अनुष्ठान से शुरू हों।

धर्म-निरपेक्ष राज्य की संवैधानिक घोषणा का यह सर्वथा उल्लंघन है। हम ऐसे आयोजनों के खिलाफ जनमत का दबाव पैदा करें।

एक धर्म की उपासना विधियों, उत्सवों, पर्वों के आयोजनों से दूसरे धर्म की उपासना विधियों या पर्वों में ठेस पहुँचे, ऐसी व्यवस्था क्यों चलनी चाहिए, जैसे आजकल हो रहा है?

मन्दिर-मस्जिद, गुरुद्वारा आदि धार्मिक केंद्रों में लाउडस्पीकरों का उपयोग होने से हमारी भक्ति-भावना नहीं बढ़ती, बल्कि हमारी प्रतिक्रियात्मक, प्रतिशोधात्मक भावनाओं का इज़हार होता है।

हम अपनी धार्मिक-साम्प्रदायिक भावनायें दूसरे पर थोपने का प्रयास न करें। हमारे विचार-आचार में तेज होगा तो वो दूसरों को भी प्रेरित करेगा, यहीं तक अपनी भावनाओं को मर्यादित रखें।

हम यह न भूलें कि कोई एक गलती करता है तो उसके जवाब में हम दस गलती करके अपना ही नुकसान करते हैं। अतः हम न गलती करेंगे, न गलती होने देंगे, न जुल्म सहेंगे की नीति पर चलें तो बेहतर होगा।

हम उन अखबारों, प्रचार-माध्यमों, नेताओं, संगठनों का बहिष्कार एवं विरोध करें, जो साम्प्रदायिकता के ज़हर को फैलाते हों। अखबारों में छपने वाले लेखों, टिप्पणियों के विरोध हम लिखित रूप में लेख, टिप्पणियाँ–संपादक के नाम पत्र लिखकर करें –जिनसे साम्प्रदायिकता का ज़हर समाज में फैलता हो।

हम जो भी धर्म, जीवन शैली, उपासना पद्धति अपनाते हों, अपनाएँ, लेकिन अपने से भिन्न दूसरे धर्मों, जीवन शैलियों, उपासना –पद्धतियों के प्रति सहिष्णु एवं उदार रहें।

हमारी इस वृत्ति से ही परस्पर संवाद –संबंध कायम रहेगा और संवादों –संबंधों के आधार पर ही हम एक दूसरे की कमियों को, यदि होगी, तो दूर करने में सहायक होंगे।

आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गैर-बराबरी समाज राष्ट्रकी सबसे बड़ी कमजोरी है। क्या हम इतिहास के तथ्यों को नकार सकते हैं कि हमारी इसी सामाजिक कमज़ोरी के चलते भारतीय समाज और राष्ट्र कमज़ोर हुआ है, टूटा है, गुलाम हुआ है, हिंसा-प्रति हिंसा का शिकार हुआ है?

इसलिए जरूरी है कि हम साम्प्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देंगे।

  • उपसंहार–

साम्प्रदायिकता के राक्षस के अंदर सबको एक ही धर्म के बनाने का पागलपन है : जो उस धर्म को नहीं मानते हैं उन सब को मिटा कर पूरे देश में और उसके बाद पूरी धरती पर एक ही धर्म की स्थापना करना साम्प्रदायिकता के राक्षस का मकसद है। लेकिन एक धर्म को छोड़कर बाकी हर धर्म को मिटा देने के बाद भी इस राक्षस को चैन नहीं मिलेगा।

क्योंकि कोई ऐसा धर्म नहीं है जिसके अनेक अलग-अलग शाखाएँ न हों। जैसे ईसाई धर्म में कैथोलिक, एंग्लिकन, बैप्टिस्ट, प्रोटेस्टेंट, मैथोडिस्ट आदि अनेक विधाएं है और इस्लाम में सुन्नी और शिया आदि विधाएँ होती हैं।

इन अलग-अलग विधाओं का फ़र्क़ कोई छोटी सी, मामूली सी चीज है। लेकिन साम्प्रदायिकता के राक्षस को यह असमानता भी गवारा नहीं।

दुनिया में ऐसे कितने सुन्नी और शिया मुसलमान हैं, जो धर्म के नाम पर एक दूसरे के खून के प्यासे हैं।

ठीक उसी तरह हमारे देश में अगर देश के अनेक सम्प्रदायों के सदस्य अगर साम्प्रदायिकता की आग में कूद पड़े और देशवासियों की जान के पीछे पड़ने लगे तो इस देश में  कभी राष्ट्रीय एकता नहीं आ पाएगी।

भारत में सांप्रदायिक सद्भाव

अगर देश को राष्ट्रीय एकीकरण चाहिए तो उसे धर्मों को बराबर रखना होगा और शांति के लिए सभी कठिन प्रयास करने होंगे।

लोगों की विचारधारा ही उन्हें साम्प्रदायिक बनाती हैं ना कि धर्म –

“मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना”

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